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________________ यह सूत्र मानवता के द्वारा हृदयंगम करने योग्य है । जिनके चित्त में विक्षेप होता है, उनके द्वारा समाधि का व्यवहार किया जाता है । उनके लिए जरूरी है कि वे ध्यान को अपने जीवन का परम मार्ग बनाएं। चित्त का धर्म ही विक्षेपमूलक है । मनुष्य का मन सदा चंचल रहता है और यही चंचलता उसके चित्त की पहचान है । मनुष्य के चित्त के धरातल पर मन की चिड़ियां पल - प्रतिपल उड़ती ही रहती हैं। ध्यान से देखोगे, तो पहचानोगे कि हमारे चित्त की स्थिति कैसी है? चित्त में कभी अतीत हिलोरें लेता है, तो कभी भविष्य की कल्पनाएं उमड़ती हैं, कभी परिजन याद आते हैं। चित्त भौंरे की तरह इधर से उधर, उधर से इधर घूमता रहता है लगातार उधेड़बुन जारी रहती है । 1 ध्यान के द्वारा यह पहचानने का प्रयास करें कि आज की तारीख में हमारे चित्त की स्थिति क्या है ? अगर चित्त में बैठे और चित्त चलता हुआ दिखाई दे, तो चिंतित मत होना; बहता हुआ दिखाई दे, तो उसको बहने देना । तुम चित्त को अलग होकर चित्त के साक्षी, द्रष्टा और दर्शक भर बने रहना । तब तुम चित्त के साथ रहते हुए भी उससे भिन्न, उससे अलग हो जाओगे । जनक कह रहे हैं कि मैंने अपने चित्त के विक्षेपों को जीत लिया है, जिसने अपने आपको जीत लिया, वह आत्मज्ञानी हो चुका। वही आदमी समाधि का व्यवहार नहीं करता। वह तो समाधिरहित होकर समाधि में तल्लीन रहता है । जनक कहते हैं कि जैसे कर्म का अनुष्ठान अज्ञान से है, वैसे ही उसके त्याग का अनुष्ठान भी अज्ञान से है । इस तत्त्व को भली-भांति जानकर मैं कर्म-अकर्म से मुक्त होकर अपने में स्थित हूं । नतीजतन मेरी ओर से किसी भी प्रकार के कर्ता का भाव नहीं, क्रिया का भाव नहीं । जिसने जाना है स्वयं को, उसके सारे कर्म ध्यानपूर्वक ही होते हैं । आत्मस्थित व्यक्ति तो चलता हुआ भी नहीं चलता । जो स्वयं से अपरिचित है, वह नहीं चलता हुआ भी चलता है। ज्ञानी सेवन करता हुआ भी सेवन नहीं करता । अज्ञानी सेवन न करता हुआ भी सेवन करता है । सवाल क्रिया का नहीं, कर्ता और भोक्ता-भाव का है, अकर्ता और द्रष्टा भाव का है । जनक कहते हैं कर्मानुष्ठानमज्ञानात् यथैवो परमस्तथा । बुद्ध्वा सम्यगिदं तत्त्वमेवमेवाह-मास्थितः ॥ अर्थात जैसे कर्म का अनुष्ठान अज्ञान से है, वैसे ही उसके त्याग का अनुष्ठान भी अज्ञान से है 1 मनुष्य जिस दिन जन्म लेता है, उसी दिन से कर्म करना प्रारंभ कर देता है । अगर बच्चा भूख के कारण रो रहा है और मां को बुला रहा है कि मुझे 94 Jain Education International For Personal & Private Use Only www.jainelibrary.org
SR No.003867
Book TitleNa Janma Na Mrutyu
Original Sutra AuthorN/A
AuthorChandraprabhsagar
PublisherPustak Mahal
Publication Year2003
Total Pages130
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size15 MB
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