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________________ ४०४ विविध पूजासंग्रह नाग प्रथम. दय पावे॥ चे ॥३॥ वृद्धि गंजीर वरे शिवकमला, अमल विपुल सुख पावे ॥ चे ॥४॥ ॥ इति ज्ञानपदपूजा ॥ काव्य तथा मंत्र बोलवां ॥ ॥अथ चारित्रपदपूजा मी॥ ॥ स्वरूप शुद्ध किरिया गहे, रहे जे निरतिचार ॥ जस बले संजम शक्ति ते, नमीए वार हजार ॥१॥ ज्ञानफल चरण रंगे धरूं, निःस्पृह आश्रव रोध ॥ नवजल प्रवहण सुखमय, सुमन करम मल शोध ॥२॥ रंक जेश्री राजा हुये, अंगोपांग नणंत ॥ पापरूप निष्पाप हुये, दीपे तेज महंत ॥३॥ कर्म खपे सिकि लहे, जन्म मरण मिटी जाय ॥ इह नवमें सुरवर नमे, परनव सुगते जाय॥४॥ ॥ढाल १ली॥राग श्याम कल्याण ॥ ॥जिनजन्म जानी दाशकुमरं। आवे रे ॥ए चाल ॥ ॥ नमन चरण गुणन ठरण मगन नावे रे, जस तत्व रमण मूल रूप गावे रे, परमे रमणिकपणुं सर्व विसरी जावे रे॥गमे खास, सिछि वास, अचल नास, रमण जास,मुगति नावे रे॥न॥१॥करमाश्रव त्याग रूप संजम सुहाव रे, तत्त्व थरता दममय। परिणति आवे रे॥शुचि परम दमादि मुनिधर्म जावे रे॥नमो Jain Educationa International For Personal and Private Use Only www.jainelibrary.org
SR No.003855
Book TitleVividh Puja Sangraha
Original Sutra AuthorN/A
AuthorShravak Bhimsinh Manek
PublisherShravak Bhimsinh Manek
Publication Year1917
Total Pages512
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size7 MB
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