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________________ श्रीविजयलक्ष्मीसूरिकृत वीश स्थानकनी पूजा. १७५ कुमर नरिंद शुज गय॥ में ॥ ४॥ यथोचित चतविद संघनी रे, जरतादिक परे नक्ति ॥अव्य नावथी आदरो रे, योग अवंचक शक्ति ॥ में ॥५॥ पदस्थ ध्याने करी आत्मने रे, तन्मय करण प्रकार ॥ सहजानंद विलासतां रे, सौलाग्यलक्ष्मी पद धार ॥ में ॥ ६ ॥ इति प्रवचनपदपूजा तृतीया ॥३॥ ॥ अथ चतुर्थ आचार्यपदपूजा प्रारंनः॥ ॥दोहा॥ ॥ उत्रीश बत्रीशी गुणे, युगप्रधान मुणींद ॥ जिनमत परमत जाणता, नमो तेह सूरीद ॥१॥ ॥ ढाल ॥ आवो आवो रे सयण, जगवती सूत्रने सुणीए ॥ ए देशी ॥ ॥सरसती त्रिजुवनस्वामिनी देवी, सिरिदेवी यदाराया ॥मंत्रराज एपंच प्रस्थाने, सेवे नित्य सुखदाया॥ नवि तुमे वंदोरे,सूरीश्वर गडराया॥१॥ए आंकणी॥ त्रण कालना जिनवंदन होये,मंत्रराज समरणथी।युगप्रधान सम नावाचारज, पंचाचार चरणथी॥ ज० ॥ २॥पनिरूवादिक चौद गुणधारी, दांति प्रमुख दश धर्म ॥बार नावना नावित निजातम, ए त्रीशगुण Jain Educationa International For Personal and Private Use Only www.jainelibrary.org
SR No.003855
Book TitleVividh Puja Sangraha
Original Sutra AuthorN/A
AuthorShravak Bhimsinh Manek
PublisherShravak Bhimsinh Manek
Publication Year1917
Total Pages512
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size7 MB
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