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________________ १३६ विविध पूजासंग्रह जाग प्रथम. लागुं, जब श्रम घर तुम पावमीयां॥ रहो ॥सुखर सुणतां लागे मीगे, तुज गुण अंबा मंजरीयां ॥ रहो ॥५॥ आदेय नाम वचन जग माने, श्रीशुनवीर मुखे चमीयां ॥ रहो० ॥ जस गुण गावे लोक बनावे, ते जस नाम ते तुम वमीयां ॥ रहो ॥६॥ ॥ काव्यं ॥ सुमनसांग ॥१॥ समयसार ॥२॥ ॥ अथ मंत्रः ॥ ॥ ॐ ही श्री परम ॥ त्रसदशकनिवारणाय पुष्पाणि य० ॥ खा ॥ इति त्रसदशकनिवारणार्थ तृतीय पुष्पपूजा समाप्ता ॥३॥४३ ॥ ॥ अथ चतुर्थ धूपपूजा प्रारंनः ॥ ॥दोहा॥ ॥ धूपे (जनवर पूजीए, प्रत्येक दाहनहार ॥पयमि न जाये मूलथी, जब लगे ए संसार ॥१॥ ॥ढाल चोथी॥वीर जिणंद जगत्लपकारी॥ए देशी॥ ॥श्राज गइ मन केरी शंका, जब तुज दर्शन दीजी॥पूर ग लोक सन्ना नगरी, आगम अमीय ते मीठजी॥ आज ॥१॥ गुरुलघु अंगे एक न होवे, अगुरुलघु ते जाणजी ॥ सास उसास लीए Jain Educationa International For Personal and Private Use Only www.jainelibrary.org
SR No.003855
Book TitleVividh Puja Sangraha
Original Sutra AuthorN/A
AuthorShravak Bhimsinh Manek
PublisherShravak Bhimsinh Manek
Publication Year1917
Total Pages512
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size7 MB
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