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________________ १५० ] पोषक आहार | ए शरीर भव मूल छें जी, तसु जाव प्रयोगी नवि हुवें जी, तां अनादि आहार ||०||७|| कवल आहारें नीहार छें जी, एह अंग' व्यवहार । धन्य प्रतनु परमातमा जी, जिहां निश्चलता सार ||०|८| पर परिणति कृत चपलता जी, किम छूट से एह । ऐम विचारी कारणें जी, करें गोचरी तेह ॥ मु०॥६॥ क्षमा दयालु पालुप्रा जी, निस्पृही तन नीराग । निर्विषयी गज गति परें जी, विचरें मुनि महाभाग ।। मु०।१०। परमानंद रस अनुभवे जी, निज गुण रमता धीर । 'देवचंद' मुनि' वदतां जी, लहीये भव जल तीर ॥ मु० | ११ || श्रीमद देवचन्द्र पद्य पीयूष मौन धारी मुनि नवि वदें, आचरण ज्ञान नें ध्यान नों, साधु जी समिति बोजी धरो, वचन निर्दोष परकास रे । गुप्ति उत्सर्गं नो समिति ते, मार्ग अपवाद सुविलास रे ॥ सा० ॥ १ ॥ भावना बीय' महाव्रत तरणी, जिन भरणी सत्यता मूल रे । भावहिं सकता वधें, सर्व संवर अनुकूल रे || सा० ॥२॥ गेह रे । वचन जे प्रश्रव साधक उपदिसें तेह रे ॥ सा०||३|| १- शरीर की रीति द्वितीय भाषा समिति सज्झाय ( भावना मालती चुसीइं, ए देशो ) Jain Educationa International २- दूसरा ३- जिनेश्वरों ने कहा है For Personal and Private Use Only www.jainelibrary.org
SR No.003830
Book TitleShrimad Devchand Padya Piyush
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHemprabhashreeji, Sohanraj Bhansali
PublisherJindattsuri Gyanbhandar
Publication Year
Total Pages292
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size10 MB
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