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________________ ४२ विनयचन्द्र कृति कुसुमाञ्जलि तिलक केसर कोरंट बकुल पाडल वली रे । ब० । दमणौ मरुव कुसुम कली बहु विध मिली रे । क० । होइ अनुकूल समीर धरइ नहीं तूलता रे । ध० । तौ किम सहृदय लोक धरै प्रतिकूलता रे ॥ ध० ||४|| देवानन्दन भूप कुलांवर दिनमणि रे | कु० | रेणुका माता नन्द लीलावती नउ धणी रे । ली० । कमल लंछन भगवान 'विनयचन्द्रइ" थण्यौ । वि० । तुम गुण गण नौ पार, कुंणइ ही नवि गुण्यो रे ॥ कुं० ॥५॥ ॥ श्री भुजंग जिनस्तवन ॥ ढाल-भूंत्रखड़ानी भुजंग देव भावइ नमुँ, भगति युगति मन आणि ॥ सलूणे साजना भुजंग नाथ वंदित सदा, सुरनर नायक जाणि | स० ॥ १॥ हुँ रागी पण तँ सही, निपट निरागी लखाय । स० । ए एकंगी प्रीतड़ी, लोकां मांहि लजाय । स० ||२|| आश्रित जन नई मूकर्ता, प्रभु अति हांसी थाय । स० । शंकर कंठइ विष धर्यो, पिण ते नवि मूकाय | स० ||३|| जे नेही नेह' मिलै, तर तेह सुं मिलियइ जाय । स० । तेह मिल्य स्युं कीजियइ, जे काम पड्यां कमलाय | स०||४|| महावल नृप महिमा तणौ, नन्दन गुण मणि धाम । स० । कमल लंडन प्रभु ना कर, विनयचन्द्र' गुण ग्राम स०||५|| Jain Educationa International For Personal and Private Use Only www.jainelibrary.org
SR No.003819
Book TitleVinaychandra kruti Kusumanjali
Original Sutra AuthorN/A
AuthorBhanvarlal Nahta
PublisherSadul Rajasthani Research Institute Bikaner
Publication Year1962
Total Pages296
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size9 MB
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