SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 77
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ ६८ दंसणा इयार - सुतं चारित्रातिचार पडिक्कमण-सुतं तस्स सव्वस्स-सुत्तं नमुक्कार-सुतं सामाइ सुत्तं मंगल-सुतं पडिक्कमण-सुतं विहितं सेज्जा - अइयार - पडिक्कमण- सुप्तं गोयर - अइयार - पडिक्कमण-सुत्तं सभायादि - अइयार - पडिक्कमण-सुत्तं एगविधादि - अइयार - पडिक्कमण-सुत्तं निग्गंथपावयणे थिरीकरण- सुत्तं खामेमि... वंदणय - सुतं ( दो बार ) पंचपद - वंदना खाणा-सुतं ८४ लाख जीवयोनि ६. पंचमं आवस्सयं देवसिय अइयार नमुक्कार-सुत्तं सामाइय-सुत्तं पडिक्कमण-सुत्तं तस्स उत्तरी चउवीसत्थव-सुत्तं ( चार बार ध्यान में, एक बार उच्चारण) वंद - सुतं (दो बार ) छट्ठ आवस्य Jain Educationa International श्रमण प्रतिक्रमण For Personal and Private Use Only १२ ६० १६ १४ १ २ १५ १६ १८ २० २१ २३ २५ ३२ ३६ ८ ६४ ३७ ६६ अईअं पच्चक्खाण-सुत्तं सक्कत्थुई (दो बार ) ५७ नोट -- १. देवसिक या रात्रिक में चार, पाक्षिक में बारह, चातुर्मासिक में बीस और सांवत्सरिक प्रतिक्रमण में चालीस 'लोगग्स' का ध्यान । ५२ १ २ १६ ५२ ४ ५५ ५५ www.jainelibrary.org
SR No.003698
Book TitleShraman Pratikraman
Original Sutra AuthorN/A
AuthorTulsi Acharya, Mahapragna Acharya
PublisherJain Vishva Bharati
Publication Year1997
Total Pages80
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, M000, & M001
File Size3 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy