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________________ परीपह-जयी जम्बूस्वामी ऊँचे राजगृही नगरी की शोभा इन्द्रपुरी को भी लजा रहा थी । राजमहल के गुम्बद के कलश उषा की किरणों के सुनहरे प्रकाश में और भी सुनहरे होकर दमक उठे थे । नगरी में उच्च अट्टालिकायें उसकी समृद्धि की परिचायक थीं । मंदिर की ध्वजा एवं कलश निवासियों के धर्म प्रेम के प्रतीक की तरह फहरा रहे थे । चौड़े राजमार्ग, बाजार की समृद्धि पूरे शहर और राज्य की सुख एवं मंगल की गाथा गा रहे थे । गीत-नृत्य के स्वर गूंजते थे । विशाल वनराजि के बीच शोभित भवन ऐसे लगते थे मानों वनदेवी की हरियाली गोद में कोई शिशु सो रहा हो । द्वारों पर बँधे वंदनवार प्रसन्नता के परिचायक थे । पूरे नगर में आनंद उत्साह था । सामन्तों, श्रेष्ठियों के रथ राजमार्ग से किंकिणी ध्वनि करते हुए मन्थर गति से जा रहे थे । हवेलियों के द्वारपर वांजित्रों की मधुर ध्वनि गूंज रही थी । राज्य में कोई भूखादि के दुख से पीड़ित नहीं था । राजा और प्रजा के बीच पिता-पुत्र के मधुर संबंध थे ! राजगृही के श्रेष्ठ अरदास अपनी प्रिय सुधर्म चारिणी जिनमती के साथ जिनेन्द्र भगवान की पूजा - भक्ति के साथ जीवन यापन कर रहे थे । सेठजी धन-धान्य के पूर्ण थे । उनकी हवेली पर हाथी झूमते थे । देश-विदेश में उनका व्यापार फैला हुआ था । उनकी शाख सर्वत्र बरकरार थी । सेठ अरदास इसे पुण्योदय मानकर निरभिमानता से धर्मका यथोचित पालन करते हुए व्यापार कार्य में लगे थे । अपने कक्ष में बैठे हुए अरहदास जब स्वाध्याय कर रहे थे । तभी • जिनमती सेठानी ने कक्ष में प्रवेश किया एवं एक ओर बैठ गईं । "T “ कहिए प्रिये । प्रातःकाल क्यों कष्ट किया ? सेठजी ने शास्त्र बंद करते हुए स्नेह से पूछा । "नाथ आज मैंने रात्रि के पिछले प्रहर में कुछ विशेष स्वप्न देखे है । " "कैसे स्वप्न प्रिये ? " "नाथ मैंने पांच स्वप्न देखे हैं वे इस प्रकार हैं - Jain B १११ For Personal and Private Use Only www.jainelibrary.org
SR No.003695
Book TitleParishah Jayi
Original Sutra AuthorN/A
AuthorShekharchandra Jain
PublisherKunthusagar Graphics Centre
Publication Year
Total Pages162
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size7 MB
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