SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 96
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ (ज्य) की ॥ ए बातां ॥ राग द्वेष उपने नही जनकुं, वि नत। अखमलकी ॥ खबर० ॥6॥५॥ ॥सुमति कुमतिनी लावणी॥ हारे तुं कुमति कलेसण नार, लगी क्युं केडे ॥ लगी ॥ चल सरक खडी रहे दूर, तुजे कुण बेडे॥ ए आंकणी ॥ हारे तुं सुमतिको नरमायो मुझे क्युं बोडी ॥ मुळे ॥ मेरी सदा शाश्वती प्रीत, बिनकमें तोमी ॥ तुझ बिन सुनि मेरी सेज, कहुँ कर जोडी ॥ कहुं ॥ ज चलो हमारे संग, सुखें रहो पहोडी ॥ यु जूर जूर कुमती आंसु, अांखसे रेडे ॥श्रांख ॥ चल ॥१॥ हारे तेरी नरक निगो दकी सेज, सेंति में रूग्यो ॥ सेंति ॥ पकड्यो सा चो जिनराज, संग तेरो बूट्यो ॥ तेरी मूरख माने वात, हैयाको फूट्यो ॥ हैया ॥ में सहेज हुवो हुँ दूर, तार तेरो त्रूट्यो ॥ तुं कर दूरसे बात, आव म त नेडे ॥ आ ॥ चल ॥२॥ तेरी अनंतकालकी प्रीत, पलक नही पाली ॥ पलक०॥सुमतिके लागो संग, मुके क्यों टाली ॥ युं सुमतिको सिरदार, सुना वे गाली ॥ सु०॥ तेरी हम दोनुं हे नार, गोरी उर काली ॥ तुं हमकू ठेले दूर, सुमतिकुं तेडे ॥ सुम॥ Jain Educationa International For Personal and Private Use Only www.jainelibrary.org
SR No.003687
Book TitleStavanavali
Original Sutra AuthorN/A
AuthorShravak Bhimsinh Manek
PublisherShravak Bhimsinh Manek
Publication Year
Total Pages162
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size6 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy