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________________ विनयश्रुत २७ अध्ययन १ : श्लोक ४७-४८ टि० ७४,७५ ७४. श्लोक ४७ ७५. (देवगंधव....मलपंकपुव्वयं....अप्परए) मोक्षविनय के पांच प्रकार हैं-दर्शनविनय, ज्ञानविनय, देवगंधब्व-यहां 'देव' शब्द से वैमानिक तथा ज्योतिष्क चारित्रविनय, तपविनय और औपचारिकविनय या अनाशातना- देवों का तथा 'गंधर्व' शब्द से व्यंतर और भुवनपति देवों का विनय।' ग्रहण किया है। प्रस्तुत श्लोक में पांचों विनयों का निर्देश है---- मलपंकपुव्वयं-मनुष्य-शरीर का निर्माण मल और पंक १. पूज्यशास्त्र-ज्ञानविनय। (रक्त और वीर्य) से होता है, इसलिए उसे मल-पंक-पूर्वक कहा २. सुविनीतसंशय-दर्शनविनय। जाता है। ३. कर्मसम्पदा-औपचारिकविनय। अप्परए-जो ‘अल्परत' होता है, मोहजनित क्रीड़ा से ४. तपःसामाचारी तथा समाधि-तपविनय। रहित होता है, उसे 'अल्परत' कहा जाता है। जिसके ५. पांच महाव्रत-चारित्रविनय । बध्यमान-कर्म अल्प होते हैं उसे 'अल्परजाः' कहा जाता है। 'अप्परए' के ये दोनों अर्थ हो सकते हैं। १. दशवकालिक नियुक्ति गाथा २६१ : दसणनाणचरिते, तवे य तह ओवयारिए चेव। एसो उ मोक्खविणयो, पंचविहो होइ नायव्यो।। बृहद्वृत्ति, पत्र ६७ : 'मलपंकपुव्वयं' ति जीवशुद्ध्यपहारितया मलवन्मलः स चासी 'पावे बज्जे वेरे पंके पणए य' त्ति वचनात् पडूकश्च कर्ममलपड्कः स पूर्व-कार्यात् प्रथमभावितया कारणमस्येति मलपडूकपूर्वक, यद्वा.....'माओउय पिऊसुक्कं' त्ति वचनात् रक्तशुक्र एव मलपडूकी तत्पूर्वकम्। ३. वही, पत्र ६७ : 'अप्परए' त्ति अल्पमिति.....अविद्यमानं रतमिति.... .... क्रीडितं मोहनीयकर्मोदयजनितमस्येति अल्परतो लवसप्तमादिः, अल्परजा चा प्रतनुबध्यमानकर्मा । Jain Education Intemational For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.003626
Book TitleAgam 30 Mool 03 Uttaradhyayana Sutra Uttarajjhayanani Terapanth
Original Sutra AuthorN/A
AuthorTulsi Acharya, Mahapragna Acharya
PublisherJain Vishva Bharati
Publication Year2006
Total Pages770
LanguagePrakrit
ClassificationBook_Devnagari, Agam, Canon, & agam_uttaradhyayan
File Size25 MB
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