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________________ उत्तरज्झयणाणि अध्ययन २ : श्लोक ४५ टि० ८२ के जितने पत्ते हैं, उतने वर्ष और लगेंगे। तपस्वी ने सुना। के लिए छह बालकों की विकुर्वणा की। आचार्य के समक्ष पहला उसका मन हर्ष से भर गया। वह नाचते हुए गुनगुनाने लगा- बच्चा आया। उसका नाम था--पृथ्वीकाय । आचार्य ने सोचा, मैं 'मेरी मुक्ति हो जाएगी। मेरी मुक्ति हो जाएगी। इसके सारे गहने ले लूं। जीवन सुखपूर्वक बीतेगा। आचार्य ने यह है धृति और अधृति का खेल । साधना में धृति रखनी बच्चे को कहा—गहने उतार कर दो। बच्चा बोला-भंते! इस होती है। भीषण अटवी में मैं आपकी शरण में आया हूं। आप ही मुझे जब साधक में वीतराग या आप्त पुरुष के अस्तित्व के लूटते हैं। यह कैसा न्याय? मेरी बात सुनें, फिर जैसा चाहें वैसा प्रति सन्देह हो जाता है तब वह उसके वचनों के प्रति भी करें। सन्देहशील बन जाता है। 'जिन' सदा सबके प्रत्यक्ष नहीं होते। जेण भिक्खं बलिं देमि, जेण पोसेमि नायए। व्यक्ति को विश्वास पर व्यवहार करना होता है। जो शास्त्र है, सा मे मही अक्कमइ, जायं सरणओ भयं ।। वे वीतराग की वाणी के आधार पर संगृहीत हैं, ऐसा मानने जो पृथ्वी सबका संरक्षण करती है, भरण-पोषण करती है, वाला साधक ही उन वचनों के आधार पर अपनी साधना का वही पृथ्वी मेरा भक्षण करती है तो लगता है कि शरण देने वाला यात्रापथ तय कर सकता है, अन्यथा नहीं। बिना विश्वास एक ही प्राण हरण करता है। पैर भी नहीं चला जा सकता। आचार्य ने उसके गहने उतार कर उसे छोड़ दिया। गहने वर्तमान में भगवान महावीर का शासन चल रहा है। वे अपने पात्र में रख लिए। चौबीसवें तीर्थकर थे। उनसे पूर्व तेईस तीर्थकर हो चुके थे। इतने में अप्काय नामक दूसरा बालक आया। वह भी इसीलिए कहा गया-'अभु जिणा'-जिन हुए थे। 'अत्थि सुअलंकृत था। आचार्य ने कहा—गहने दे दे, अन्यथा मार जिणा'—जिन हैं—यह कथन तीर्थकर महावीर की सूचना देता डालूंगा। लड़का बोला-मेरी बात सुनें। पाटल नाम का व्याक्ति है। वृत्तिकार ने लिखा है कि यह अध्ययन कर्मप्रवाद पूर्व के कथा कहकर आजीविका चलाता था। एक बार वह गंगा नदी को सतरहवें प्राभृत से उद्धृत किया गया है और सुधर्मा स्वामी ने पार कर रहा था। इतने में ही उसमें तीव्र प्रवाह आया और वह प्रत्यक्षतः जम्बूस्वामी को यह कहा है, इसलिए वीतराग की पाटल बहने लगा। भंते! देखेंउपस्थिति का उल्लेख है अथवा महाविदेह आदि क्षेत्रों की अपेक्षा जेण रोहति बीयाणि, जेण जीयंति कासया। से भी यह कथन यथार्थ है। वहां तीर्थकर सदा रहते हैं। तस्स मज्झे विवज्जामि, जायं सरणओ भयं।। चौवालीसवें श्लोक के 'नत्थि नूणं परे लोए' को आधार जिस जल के प्रभाव से बीज उत्पन्न होते हैं, कृषक जीवन बनाकर व्याख्याकारों ने आचार्य आषाढ़ का कथानक प्रस्तुत यापान करते हैं, वही जल मुझे मार रहा है। यह सच है कि किया है। वह इस प्रकार है शरण देने वाला ही प्राण हरण कर रहा है। वत्सभूमि में आषाढ़ विचरण कर रहे थे। वे एक गण के आचार्य ने उसके गहने ले लिए और उसे अभयदान देकर आचार्य थे। वे बहुश्रुत और अनेक शिष्यों के आचार्य थे। उस छोड़ दिया। गण में जो-जो मुनि दिवंगत होते, वे उनको अनशन करवाते तीसरा बालक तेजस्काय सामने आया। उसने गिड़गिड़ाते और कहते-जब तुम देव बनो, तब अवश्य ही मुझे दर्शन हुए कहा--गुरुदेव! एक कथा सुनें । एक जंगल में तपस्वी रहता देना। वर्ष बीत गए। अनेक संथारे हुए, परन्तु कोई लौटकर नहीं था। वह प्रतिदिन अग्नि की पूजा करता, आहुति देता। एक बार आया। एक बार एक अत्यन्त प्रिय शिष्य मृत्यु शय्या पर था। उसी आग से उसकी झोपड़ी जल कर राख हो गई। उस तपस्वी आचार्य ने उसे भक्त प्रत्याख्यान कराते हए कहा-देवरूप में ने कहाउत्पन्न होते ही शीघ्र यहां आकर दर्शन देना, प्रमाद मत करना। जमहं दिया राओ य, तप्पेमि महुसप्पिसा। मुनि की मृत्यु हो गई। पर वह भी नहीं आया। आचार्य ने सोचा, तेण मे उडओ दड्ढो, जायं सरणओ भयं ।। यह निश्चित है कि परलोक है ही नहीं। अनेक गए, पर कोई मैं जिस आग का मधु और घृत से सिंचन करता था, उसी नहीं आया। अतः यह व्रतचर्या निरर्थक है। मैंने व्यर्थ ही भोगों अग्नि ने मेरा–उटज जला डाला। शरण देने वाला भी भयप्रद का परित्याग किया। आचार्य डावांडोल हो गए। उसी मुनिवेश हो गया। में वे गण का त्याग कर चले गए। इतने में ही उनके एक एक व्यक्ति जंगल में जा रहा था। इतने में ही व्याघ्र आता दिवंगत शिष्य ने देखा। उनको प्रतिबोध देने के लिए उसने मार्ग हुआ दिखा। उसने अग्नि की शरण ली। अग्नि जला कर वह में एक गांव की रचना की और वहां नृत्य का आयोजन किया। वहां बैठ गया। अग्नि को देखकर व्याघ्र भाग गया, पर उस आचार्य वहां छह माह तक रहे। न उन्हें भूख सताती थी, न अग्नि ने उसे जला डाला। जिसको शरण माना था, वही अशरण प्यास और न श्रम। छह माह के काल का बीतना भी हो गया। उन्होंने नहीं जाना । देवता ने अपनी माया समेटी। आचार्य वहां आचार्य ने उसके गहने ले लिए और उसे जीवित छोड़ से चले। देवता ने उनके संयम के परिणामों की परीक्षा करने दिया। Jain Education Intemational ucation Intermational For Private & Personal Use Only For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.003626
Book TitleAgam 30 Mool 03 Uttaradhyayana Sutra Uttarajjhayanani Terapanth
Original Sutra AuthorN/A
AuthorTulsi Acharya, Mahapragna Acharya
PublisherJain Vishva Bharati
Publication Year2006
Total Pages770
LanguagePrakrit
ClassificationBook_Devnagari, Agam, Canon, & agam_uttaradhyayan
File Size25 MB
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