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________________ २६. जघन्य थकी इक ऊपजै जी, अथवा बे तथा तीन । उत्कृष्ट संखेज्जा नेरइया जी, ऊपजै छै अति दीन ।। २६. जहण्णणं एक्को वा दो वा तिण्णि वा, उक्कोसेणं संखेज्जा नेरइया उववज्जति । सोरठा २७. नरकावासो एह, संख्याता योजन तणो। ते माटे उपजेह, संख्याताईज नेरइया ।। २८. *इक बे तीन वलि जघन्य थी जी, उत्कृष्टा संख्यात । कापोतलेणी ऊपजै जी, धुर नरके ए थात ।। २६. इक बे तीन बलि जघन्य थी जी, संख्याता उत्कृष्ट । कृष्णपक्षी जे ऊपजै जी, शुक्लपक्षी इम दृष्ट ।। २८. जहणणं एक्को वा दो वा तिणि वा, उक्कोसेणं संखेज्जा काउलेस्सा उववज्जति । २९. जहणणं एक्को बा दो वा तिणि वा, उक्कोसेणं संखेज्जा कण्हपक्खिया उवबज्जति । एवं सुक्क पक्खिया वि, ३०. एवं सण्णी, एवं असण्णी, ३०. संजी कहिवा इह विधे जी. एम असंज्ञी ताम। विभंग ज्यां लग नावियो जी, इतरे असंज्ञी नाम ।। सोरठा ३१. 'प्रथम नरक रै मांहि, जेह असंज्ञी ऊपजै । ___अंतर्मुहर्त ताहि, विभंग अनाण लहै नहीं ।। ३२. कह्यो असंज्ञी तास, भेद जीव नों तेरमो। असंज्ञी तणो विमास, भेद जीव रो त्यां नथी । ३३. भवनपती रै मांय, व्यंतर में पिण ऊपजै । जीव असंज्ञी जाय, कह्या असंज्ञी तास पिण ।। ३४. ए पिण तेरम भेद, पिण असन्नी नो भेद नहि । स्त्री अथवा पु-वेद, वेद नपुंसक नहिं सुरे ।। ३५. असन्नी नो कहै भेद, तिणरै लेखै देव में। ___ कहियै नपुंस-वेद, सुर नपुंस निश्चै नथी। ३६. द्वादश असन्नी भेद, निश्चै तेह नपुंसका। ते माटे तज खेद, पेखो ए सुर में नथी ।। ३७. नारक ने सुर मांहि, असन्नी सूत्रे आखिया । पिण असन्नी नो ताहि, भेद तिहां पावै नहीं। ३८. दशवकालिक मांहि, आख्या अध्येन आटमें। सूक्षम आठज ताहि. पिण सूक्षम नों भेद नहिं ।। ३६. जीवाभिगमे जोय, ते गति आश्री सोय, तेऊ वाऊ त्रस कहा। त्रस नों भेद तिहां नथी॥ ३८. सिणेहं पुफ्फसुहुमं च पाणुत्तिगं तहेव य पणगं बीयहरियं च अंडसुहुमं च अट्ठमं (दसवे ८/१५) ३९. से कि तं तसा? तसा तिविहा पण्णत्ता, तं जहा -- तेउक्काइया वाउक्काइया ओराला तसा। (जीवा० १/७५) ४०. मणूसा दुविहा पण्णत्ता, तं जहा-सण्णिभूया य असण्णिभूया य ।........ (पण्ण. १५/४८) ४०. पनरम पद रै माय, विशिष्ट अवधी रहित नर । ___असन्नीभूत कहाय, पिण असन्नी नो भेद नहीं ।। ४१. समुच्छिम मनुष्य पर्याप्त, आख्यो अनुयोगद्वार में। कांइक पर्याप्ति आप्त, पिण पर्याप्त रो भेद नहीं । *लय : अभड भड रावणा इदा स्यू अडियो १. असंज्ञी पंचेन्द्रिय के दो भेद-.---११ वां और १२ वां २. समूच्छिम मनुष्य पर्याप्त होता है या अपर्याप्त ? इस सम्बन्ध में अनुयोगद्वार में कोई स्पष्ट उल्लेख नहीं है। मनुष्य की अवगाहना के प्रसंग में संमूच्छिम श०१३, उ० १, ढा०२७२ १२७ Jain Education Intemational For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.003620
Book TitleBhagavati Jod 04
Original Sutra AuthorN/A
AuthorTulsi Acharya, Mahapragna Acharya
PublisherJain Vishva Bharati
Publication Year1994
Total Pages460
LanguagePrakrit
ClassificationBook_Devnagari, Agam, Canon, & agam_bhagwati
File Size24 MB
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