SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 112
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ आगमिक गच्छ ७१ सोमरत्नसूरि [वि० सं० १५४८-८१ ] प्रतिमालेख कल्याणराजसूरि __अमररत्नसूरिशिष्य [अमररत्नसूरिफागु के कर्ता] गुणनिधानसूरि क्षमाकलश [ वि० सं० १५५१ में सुन्दरराजारास एवं वि० सं० १५५३ में ललिताङ्गकुमाररास के कर्ता] उदयरत्नसूरि[ वि० सं० १५८६-८७ ] प्रतिमालेख सौभाग्यसुन्दरसूरि गुणमेरुसूरि [ वि० सं० १६१०] । प्रतिमालेख मतिसागरसूरि धर्मरत्नसूरि [वि० सं० १५९४ में लघुक्षेत्रसमासचौपाई के रचनाकार] मेघरत्नसूरि जैसा कि पूर्व में ही स्पष्ट किया जा चुका है, अभयसिंहसूरि के पश्चात् उनके शिष्यों अमरसिंहसूरि और सोमतिलकसूरि से आगमिकगच्छ की दो शाखायें अस्तित्व में आयीं । अमरसिंहसूरि की शिष्यसंतति आगे चलकर धंधूकीया शाखा के नाम से जानी गयी । उसी प्रकार सोमतिलकसूरि की शिष्य परम्परा विडालंबीयाशाखा के नाम से प्रसिद्ध हुई। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.003614
Book TitleJain Shwetambar Gaccho ka Sankshipta Itihas Part 01
Original Sutra AuthorN/A
AuthorShivprasad
PublisherOmkarsuri Gyanmandir Surat
Publication Year2009
Total Pages714
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size19 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy