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________________ अर्जुन को उपदेश देता है ? वह योग समत्व-योग ही है, जिसके श्रेष्ठत्व का प्रतिपादन किया गया है। समत्व योग में योगशब्द का अर्थ जोड़ना' नहीं है, क्योंकि ऐसी अवस्था में समत्व-योग भी साधन-योग होगा, साध्य-योग नहीं। ध्यान या समाधि भी समत्व-योग का साधन है।66 गीता में समत्व का अर्थ गीता के समत्व-योग को समझने के लिए यह देखना होगा कि समत्व का गीता में क्या अर्थ है ? आचार्य शंकर लिखते हैं कि समत्व का अर्थ तुल्यता है, आत्मवत्-दृष्टि है, जैसे मुझे सुख प्रिय एवं अनुकूल है और दुःख अप्रिय एवं प्रतिकूल है। इस प्रकार, जो सब प्राणियों में अपने ही समान सुख एवं दुःख को तुल्यभाव से अनुकूल एवं प्रतिकूल रूप में देखता है, किसी के भी प्रतिकूल आचरण नहीं करता, वही समदर्शी है। सभी प्राणियों के प्रति आत्मवत्-दृष्टि रखना समत्व है, लेकिन समत्व न केवल तुल्यदृष्टि या आत्मवत्-दृष्टि है, वरन् मध्यस्थदृष्टि, वीतरागदृष्टि एवं अनासक्त-दृष्टि भी है। सुख-दुःख आदि जीवन के सभी अनुकूल और प्रतिकूल संयोगों में समभाव रखना, मान और अपमान, सिद्धि और असिद्धि में मन का विचलित नहीं होना, शत्रु और मित्र-दोनों में माध्यस्थवृत्ति, आसक्ति और राग-द्वेष का अभाव ही समत्वयोग है। वैचारिकदृष्टि से पक्षाग्रह एवं संकल्प-विकल्पों से मानस का मुक्त होना ही समत्व है। गीता में समत्व-योग की शिक्षा गीता में अनेक स्थलों पर समत्व-योग की शिक्षा दी गई है। श्रीकृष्ण कहते हैं, हे अर्जुन ! जो सुख-दुःख में समभाव रखता है, उस धीर (समभावी) व्यक्ति को इन्द्रियों के सुखदुःखादि विषय व्याकुल नहीं करते, वह मोक्ष या अमृतत्व का अधिकारी होता है। सुखदुःख, लाभ-हानि, जय-पराजय आदि में समत्वभाव धारण कर, फिर यदि तू युद्ध करेगा, तो पाप नहीं लगेगा, क्योंकि जो समत्व से युक्त होता है, उससे कोई पाप ही नहीं होता है। हे अर्जुन! आसक्ति का त्याग कर, सिद्धि एवं असिद्धि में समभाव रखकर, समत्व से युक्त हो, तू कर्मो का आचरण कर, क्योंकि यह समत्व ही योग है। समत्व-बुद्धियोग से सकाम-कर्म अति तुच्छ है, इसलिए हे अर्जुन !, समत्व-बुद्धियोग का आश्रय ले, क्योंकि फल की वासना, अर्थात् आसक्ति रखनेवाले अत्यन्त दीन है।" समत्व-बुद्धि से युक्त पुरुष पाप और पुण्य-दोनों से अलिप्त रहता है (अर्थात् समभाव होने पर कर्म बन्धनकारक नहीं होते), इसलिए समत्व-बुद्धियोग के लिए ही चेष्टा कर, समत्वबुद्धिरूप योग ही कर्म-बन्धन से छूटने का उपाय है, पाप-पुण्य से बचकर अनासक्त एवं साम्यबुद्धि से कर्म करने की कुशलता ही योग है। जो स्वाभाविक उपलब्धियों में सन्तुष्ट है, राग-द्वेष एवं ईर्ष्या से रहित निर्द्वन्द्व एवं सिद्धि-असिद्धि में समभाव से युक्त है, वह जीवन के सामान्य व्यापारों को करते हुए भी बन्धन में नहीं आता है। हे अर्जुन! अनेक प्रकार के सिद्धान्तों से विचलित तेरी बुद्धि जब समाधियुक्त हो निश्चल एवं स्थिर हो जाएगी, तब तू समत्वयोग को प्राप्त हो जाएगा। जो भी प्राणी अपनी वासनात्मक-आत्मा को 12 : समत्वयोग और अन्य योग Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.003605
Book TitleSamatva Yoga aur Anya Yoga
Original Sutra AuthorN/A
AuthorSagarmal Jain
PublisherPrachya Vidyapith Shajapur
Publication Year2010
Total Pages38
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size3 MB
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