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________________ ८ : तत्त्वार्थसूत्र और उसकी परम्परा निर्मित हुआ । दुर्भाग्य यह है कि हमारे दिगम्बर विद्वान् आगमों की अन्तिम वाचना (सम्पादन) और उनके पुस्तकारूढ़ होने अर्थात् ताड़पत्रों पर लिखे जाने के काल को ही आगम का रचना काल मान लेते हैं । यदि उसके पूर्व आगम थे ही नहीं, तो वलभो में संकलन और सम्पादन किसका हुआ होगा ? क्या वलभी में कोई नये आगम ग्रन्थ रचे गये थे ? यदि दिगम्बर परम्पराके विद्वानों के अनुसार तत्त्वार्थ को रचना के समय आगम थे ही नहीं तो फिर दिगम्बर परम्परा में उपलब्ध तत्त्वार्थसूत्र की उत्थानिका में उमास्वाति ने ऐसा स्पष्ट उल्लेख क्यों नहीं किया कि. वर्तमान में अङ्ग अङ्ग श्रुतरूप आगमों का उच्छेद हो गया है और इसलिए जनसाधारण को जैनतत्त्वज्ञान का बोध कराने के लिये मैं इस ग्रन्थ की रचना में प्रवृत्त हुआ हूँ । यदि उमास्वाति ने कुन्दकुन्द के ग्रन्थों को ही अपना आधार बनाया तो फिर तत्त्वार्थसूत्र एवं उसकी दिगम्बर टीकाओं की उत्थानिकाओं में कहीं भी कुन्दकुन्द को नामोल्लेख पूर्वक नमस्कार क्यों नहीं किया ? क्यों तत्त्वार्थसूत्र की पूज्यपाद देवनन्दी की सर्वार्थसिद्धि और अकलंक की राजवार्तिक आदि टीकायें उसके कर्ता के सम्बन्ध में भी कोई निर्देश नहीं करती ? जबकि तत्त्वार्थभाष्य में तो स्पष्ट रूप से इस बात का प्रतिपादन किया गया है कि आगम के गम्भीर विषयों का सरलतापूर्वक संक्षेप में बोध कराने के लिए ही मैं इस ग्रन्थ की रचना में प्रवृत हुआ हूँ वे तत्त्वार्थभाष्य में अपने वंशपरिचय के साथ-साथ अपनी गुरु परम्परा का उल्लेख करते हैं। जबकि तत्त्वार्थसूत्र की प्राचीन १. सर्वार्थसिद्धि, पं० फूलचन्दजी सिद्धान्तशास्त्री, भारतीय ज्ञानपीठ काशी प्रस्तावना पृ० ३७ । २. वाचकमुख्यस्य शिव श्रियः प्रकाशयशसः प्रशिष्येण । शिष्येण घोषनन्दि- क्षमाश्रमणस्यैकादशाङ्गविदः ॥ १ ॥ वाचनया च महावाचकक्षमण मुण्डपादशिष्यस्य । शिष्येण वाचकाचार्यमूलनाम्नः प्रथितकीर्तेः ॥ २ ॥ न्यग्रोधकाप्रसूतेन विहरता पुरवरे कुसुमनाम्नि । कौभीषणिना स्वातितनयेन वात्सीसुतेनार्घ्यम् ||३|| अर्हद्वचनं सम्यग् गुरुक्रमेणागतं समवधार्य । दुःखार्तं च दुरागम - विहतमतिलोकमवलोक्य ॥४॥ इदमुच्चैर्नागरवाचकेन सत्त्वानुकम्पया दृब्धम् । तत्त्वार्थाधिगमाख्यं, स्पष्टमुमास्वातिना शास्त्रम् ॥५॥ Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.003603
Book TitleTattvartha Sutra aur Uski Parampara
Original Sutra AuthorN/A
AuthorSagarmal Jain
PublisherParshwanath Vidyapith
Publication Year1994
Total Pages162
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Tattvartha Sutra, History, Tattvartha Sutra, & Tattvarth
File Size8 MB
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