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________________ ५७० व्याख्या अनगार पर क्रिया का त्रियोग से त्याग करे इस गाथा में साधु को अपनी मौलिक मर्यादाओं का भान कराकर मन-वचन काया तीनों योगों से पर-क्रिया से विरत होने की प्रेरणा दी गई है । साधु को अपनी मौलिक मर्यादाओं का भान कराने के लिए शास्त्रकार ने साधु के लिए यहाँ पाँच विशेषणों का प्रयोग किया है - 'सुविशुद्धलेश्यावान्, मेधावी, ज्ञानी, सर्वस्पर्शसह, और अनगार ।' सूत्रकृतांग सूत्र सुविशुद्ध-श्यावान् का अर्थ है - जिसकी चित्तवृत्ति विशेष रूप से स्त्रीसंसर्ग के त्यागरूप होने के कारण निष्कलंक - सुविशुद्ध है । मेधावी का अर्थ है - जो मर्यादा स्थित है। ज्ञान का अर्थ है - जो स्व-पर, या हेय ज्ञय उपादेय को या जानने योग्य पदार्थों को भली-भांति जानता है । सर्वस्पर्शसह का अर्थ है स्त्री - स्पर्शपरीषह से लेकर अन्य सभी शीत-उष्ण, दंश-मशक, तृण आदि जितने भी स्पर्श हैं, उन सबको जो समभाव से सहता है । और अनगार का अर्थ है - जो घरबार, कुटुम्ब - परिवार, धन-सम्पत्ति, जमीन-जायदाद, गृह सम्बन्धी समस्त सांसारिक रिश्ते-नाते, लेन-देन, व्यवहार एवं स्त्री- बालक आदि का मोहजनित सम्पर्क छोड़कर संयम में स्थित है । इन पाँच विशेषणों द्वारा साधु जीवन की मर्यादाएँ समझाकर शास्त्रकार मूल मुद्दे की बात कहते हैं- 'माणसा वयसा काएणं परिकिरियं च वज्जए ।' यहाँ परक्रिया का मन-वचन-काया इन त्रियोग से, तथा उपलक्षण से तीन करण (करना, कराना और अनुमोदन तीनों) से त्याग करने का निर्देश किया है। परक्रिया के यहाँ लगभग चार अर्थ प्रतीत होते हैं - ( १ ) आत्मभावों से अन्य परभावों अनात्मभावों की क्रिया, अथवा आत्महित में बाधक क्रिया; (२) स्त्री आदि आत्मगुणबाधक पदार्थ के लिए जो क्रिया की जाती है, अर्थात् विषय का उपभोग देकर जो दूसरे का उपकार किया जाता है, वह परक्रिया है । ( ३ ) विषय-भोग की सामग्री देकर दूसरे की कुछ सहायता करना भी परक्रिया है; (४) दूसरे – गृहस्थ नर-नारी से अपने पैर दबवाना, पैर धुलाना आदि सेवा कराना भी परक्रिया है । इन चारों प्रकार के अर्थों की छाया में पूर्वोक्त पाँच विशेषणों से युक्त साधु मन, वचन और शरीर से परक्रिया का सर्वथा त्याग करे । तात्पर्य यह है कि साधु परक्रिया ( एक अर्थ के अनुसार ) - औदारिक एवं दिव्य कामभोग के लिए मन से भी विचार न करे, दूसरे को भी मन से प्रेरित न करे, मन से ऐसा विचार करने को अच्छा न समझे । इसी प्रकार वचन से एवं शरीर से भी समझ लेना चाहिए। औदारिक काम भोग के नौ भंद होते हैं, वैसे ही Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.003599
Book TitleAgam 02 Ang 02 Sutrakrutang Sutra Part 01 Sthanakvasi
Original Sutra AuthorSudharmaswami
AuthorHemchandraji Maharaj, Amarmuni, Nemichandramuni
PublisherAtmagyan Pith
Publication Year1979
Total Pages1042
LanguagePrakrit, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Agam, Canon, & agam_sutrakritang
File Size17 MB
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