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________________ १०८ छप्पय-छेत्तुं छप्पय (षट्पद) ज २११२ १०१६३ से ७४;१६।५,६ छब्भंग (षटभङ्ग) प २८।११६,१२३,१२५,१३३, छायागति (छायागति) प १६।३८,४७ १३६,१४३ से १४५ छायाणमाणप्पमाण (छायानुमानप्रमाण) सू ।३ छन्भाग (षटभाग) प २१६४ ज १११८,६।३२।१।। छायाणुवादिणी (छायानुवादिनी) सू ६।४ छमास (षण्मास) सू १।१६ छायाणुवायगति (छायानुपातगति) प १६।३८,४८ छम्मास (षण्मास) ज २।४६,७।२३,२५,२८,३०, छायाल (षट्चत्वारिंशत् ) प २।४०।४ ज ४।८६ ५७,६० सू १११३,१४,१७,२१,२४,२७,२।३; छायालीस (षट्चत्वारिंशत्) सू १४७ ६।११६।२५,२७ छायाविकंप (छायाविकम्प) सू ६।४ छम्मासावसेसाउय (छण्मासावशेषायुष्क) छारियभूय (क्षारिक भूत) ज २११३२,१४१ प६।११४ छावट्ठ (षट्पष्टि) ज ७।२७ छल (षष्) ज ७/२०१ सू १२।१२ छावठ्ठि (षट्षष्टि) प १८७६ ज ११२० छलंस (षडस्र) ज ३।६२,११६ सू १।११;१२।३ छलसीय (षडशीति) ज ४।४५;७।३१ सू ४।४; छावत्तर (षट्सप्तति) ज ७१ सू१६।१११,१११३ १५।२६ छावतरि (षट्सप्तति) प २१४०।२ छल्ली (छल्ली) प ११४८।३० से ३७,६३ छिद (छिद) छिदंति ज ५१५७ छियामि उ १८८ छवि (छवि) ज २।१६,३६,४१,१३३, ३३१०६ छिज्ज (छेद्य) उ ३।११४ छविच्छेय (छविच्छेद) ज २।३६,४१ छिण्ण (छिन्न) ज २८८,८६,३१२२५ छविधर (छविधर) ज ७१७८ छिण्णरुहा (छिन्नरुहा) प ११४८।३ गुडूची छविहर (छविधर) ज ७।१७८ छिद्द (छिद्र) प २।१० उ १६५,६६,१०५ छविध (षविध) प ६।११८ छिण्णलेसा (छिन्नलेश्या) सू ६।१ छविय (दे०) प १९७ कट आदि बनाने वाला छिन्नसोय (छिन्नस्रोतस,छिन्नशोक) ज २१६८ छविह (षविध) प १६१,६४,६५,६।११६ छिप्पतूर (क्षिप्रतूर्य) उ १११३८ १३।६।१५।३५,७०,२११२६,३१,३२,३४,३६, छिया (दे०) ज २१६७ २२।८३,८४,८६,२३।४५,४६; २४।२,४,८, छीइत्ता (क्षुत्वा) ज २१४६ १० से १२,२६।२,४,६,८ से १०,२६।६; छोरविरालिया (क्षीरबिडालिका) प १७६ ३०॥२ ज २१२,३,५०,५८,१२३,१२८,१४८, छौरविराली (क्षीरविदारी) प १४४०१४ १५१,१५७,१६४;४।१०१,१७१ ११४८।२ सफेद और अधिक दूध वाली छव्वीस (षड्विंशति) प २।२३ ज ७।१०८ विदारी सू ११२१ छाउद्देस (छायोद्देश) सू ६।२ छुरघरगसंठिय (क्षुरगृहकसंस्थित) सू १०॥३६ छाउमत्थिय (छाद्मस्थिक) प ३६।५३ से ५६,५८ छुरघरय (क्षुरगृहक) ज ७।१३३।१ छाणविच्छ्य (छगणवृश्चिक) प ११५१ छुहा (क्षुधा) प २१६४।१६ छायच्छाय (छायाछाया) सू ६।४ छेइत्ता (छित्त्वा) उ ३।१५०, ५।२८,४१ छाया (छाया) प २।३०,३१,४१,४६; १६:४८ छेज्ज (छेद्य) ज ३।३२ ज ११८,२३,३१,२११६,२०,१४६; ३।३,११७।१ छेता (छित्त्वा ) ज ७.२२ सू १११६ १२७:५।३२,७।१५६ से १६७।१ सू ६।४; छेत्तुं (छेत्तुम् ) ज २।६।१ Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.003555
Book TitleUvangsuttani Part 05
Original Sutra AuthorN/A
AuthorTulsi Acharya, Mahapragna Acharya
PublisherJain Vishva Bharati
Publication Year1989
Total Pages1178
LanguagePrakrit
ClassificationBook_Devnagari, Agam, & Canon
File Size22 MB
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