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________________ ८३० अबाहणिया-अभवसिद्धिय ६,८ से १३,६४,६५,६७ से ७२,८८,८६,६१, ७४,८४; २३७८,७६,१६६; २६।२१ ६२,१६८।१,१७१ से १७४,१८२ सू १८१५,६ ज ३१८,६३,१८०; ७।१८७ से १६० अबाहूणिया (अबाधोनिका) प २३।६० से ६४,६६ सू १८।२५ से ३० उ ३।१६ ६८,६६,७३ से ७७,८१,८३,८५. से ६०,६२, अभितर (आभ्यन्तर) प १५३५५; ३३।११ ६५ से १६,१०१ से १०४,१११ से ११४, ज १७, २११२; ४,२१; ५।३६ सू १।१४, ११६ से ११८,१२७,१३०,१३१,१३३,१७६, १६,२१,२४,२७ से २६,३१; २।३; ४।६; १७७,१८२,१८३,१८७,१६० ६।१; ८।१, १६।२१।१ अबीय (अद्वितीय) ज ३१२०,३३,८४,१८२ अभिंतरओ (अभ्यन्तरतस्) ज ३।२४।२,१३१२ अब्भइय (अभ्यधिक) प १८।४ उ २८ अभंग (अभि । अञ्ज) अब्भंगेइ उ ३।११४ अभिंतरग (आभ्यन्तरक) प ११४८।४५ अब्भंगेति ज ५।१४ अभिंतरय (आभ्यंत रक) उ ११४४ अभंगण (अभ्यञ्जन) उ ३।११४,११५,११६ अभिंतरिय (आभ्यंतरक) ज ४।१६ अब्भंगेत्ता (अभ्यज्य) ज ५।१४। अब्भुक्ख (अभि + उक्ष ) अब्भुक्खेइ ज ३।१२, अब्भंतर (आभ्यन्तर) प ३६।८१ ज ३।१८४; ८८ उ०४।२१ ४।१५२; ७।५,८,९,१०,१३ से १६,१६ से अब्भुक्खेत्ता (अभ्युक्ष्य) ज ३।१२ २२,२५ से २७,३०,३१,३३,६४,६७ से ६६, अब्भुग्गय (अभ्युद्गत) प ४।४८ ज १।४२; २।१५; ७२ से ७५,७८ से ८१,८४,८८,६१,६३,६५, ४।४६, २२१, ७१७६,१७८ सू १८१८ १७५ सू ११११,१२,१४,१६,१७,२१,२४, अब्भुट्ठ (अभि-+-उत्+ ष्ठा) अब्भुट ठेइ २७,३०; २१३; ३३१,२, ४७; ६।१; ६।२; ज ३।६,२६,३६,४७,१३३, २१४, ५२२१ १०।१३२; १३।१३; १६१, १६।२२।१२ उ ३३१०१-अब्भुट्ठमि उ ३३१३६; ४।१४ -~-अब्भुट्ठ हि उ ३।११५ अब्भंतर पुरक्खरद्ध (आभ्यन्तर पुस्करार्द्ध) सूचा१ अब्भुठ्ठिय (अभ्युत्थित) ज २७० १६।१६ से १६ अब्भुठेत्ता (अभ्युत्थाय) ज ३।६ उ ३।१०१, अभंतरिय (आभ्यन्तरिक) सू ४।३,४,६,७ अब्भंतरिल्ल (आभ्यंतरिक) ज ७१७५ सू१८७ अब्भुण्णय (अभ्युन्नत) ज २११५; ७१७८ अब्भक्खाण (अभ्याख्यान) प २२०२० अब्भुवगम (अभ्युपगम) प ३५।१।१ अब्भणुण्णाय (अभ्यनुज्ञात) उ ३।१०६,१०८,१३८; अब्भोरुह (अभ्यवरुह) प ११४४।१ ४।११ अब्भोवगमिया (आभ्युपगमिकी) प ३५।१२,१३ अब्भपडल (अध्रपटल) प १।२०।२; १११७५ अभंगय (अभङ्गक) प २६।६; २८।११६ अब्भवद्दलय (अभ्रवादलक) ज ५७ अभवखेय (अभक्ष्य) उ ३।३७ से ४० अब्भवालुया (अभ्रवालुका) प १।२०१२ अभड (अभट) ज ३।१२,२८,४१,४६,५८,६६,७४, अब्भहिय (अभ्यधिक) प ४।१७१,१७३,१७४,१७६, १४७,१६८,२१२,२१३ १७७,१७६,१८०,१८२,१८३,१८५,१८६, अभय (अभय) उ ११३१,४२ से ४६,४८ १८८; १५,१०,२०,३०,३२,७२,८१,१०२, अभयदय (अभयदय) ज ५।२१ १२६,१३१,१३२,१३४,१६०,१७७,१६३, अभवसिद्धिय (अभवसिद्धिक) प ३।११३,१८३; २१४,२२८; १७।६३; १८१२८,४७,६०,६६ से १२१७,२०; १८११२३, २८।११२ Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.003555
Book TitleUvangsuttani Part 05
Original Sutra AuthorN/A
AuthorTulsi Acharya, Mahapragna Acharya
PublisherJain Vishva Bharati
Publication Year1989
Total Pages1178
LanguagePrakrit
ClassificationBook_Devnagari, Agam, & Canon
File Size22 MB
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