________________ पृष्ठ 170 172 177 विषय अभिन्न उपयोगवाद केवलज्ञान का उपसंहार वाग्योग और श्रुत परोक्ष ज्ञान मति और श्रुत के दो रूप प्राभिनिबोधिक ज्ञान के भेद श्रौत्पत्तिकी बुद्धि का लक्षण प्रौत्पत्तिकी बुद्धि के उदाहरण वैनयिकी बुद्धि का लक्षण वैनयिको बुद्धि के उदाहरण कर्मजावृद्धि लक्षण और उदाहरण पारिणामिकी बुद्धि का लक्षण पारिणामिकी बुद्धि के उदाहरण श्रुतनिश्रित मतिज्ञान अवग्रह ईहा 60 179 180 182 183 185 186 188 189 191 192 192 ~ अवाय पृष्ठ विषय 67 आचारांग के अन्तर्वर्ती विषय सूत्रकृतांग स्थानांग समवायांग व्याख्याप्रज्ञप्ति ज्ञाताधर्मकथा उपासकदशांग अन्तकृद्दशांग 95 अनुत्तरोपपातिकदशा प्रश्नव्याकरण 102 प्रश्नव्याकरण के विषय में दिगंबरमान्यता 104 विपाकसूत्र 104 दृष्टिवादश्रुत 126 परिकर्म 128 सिद्धश्रेणिका परिकर्म 31 मनुष्यश्रेणिका परिकर्म 132 पृष्टश्रेणिका परिकर्भ अवगाढश्रेणिका परिकर्म 134 उपसम्पादनश्रेणिका परिकर्म 135 विप्रजहत्श्रेणिका परिकर्म 136 च्युताच्युतश्रेणिका परिकर्म 138 सूत्र 142 पूर्व 143 अनुयोग 146 चूलिका 147 दृष्टिवाद का उपसंहार 147 द्वादशांग का संक्षिप्त सारांश 149 द्वादशांग की अाराधना का सुफल 152 गणिपिटक की शाश्वतता 155 श्रुतज्ञान के भेद और पठनविधि 157 व्याख्या करने की विधि 160 श्रुतज्ञान किसे दिया जाय ? 165 बुद्धि के आठ गुण 166 परिशिष्ट 194 194 195 196 197 19 धारणा अवग्रह आदि का काल व्यंजनावग्रह-प्रतिबोधक-दृष्टान्त मल्लकदृष्टान्त से व्यंजनावग्रह अवग्रहादि के छह उदाहरण मतिज्ञान का विषयवर्णन ग्राभिनिबोधिक ज्ञान का उपसंहार श्रुतज्ञान अक्षरश्रुत अनक्षरश्रुत संज्ञि-असंज्ञिश्रुत सम्यक्श्रुत मिथ्याश्रुत सादि सान्त अनादि अनन्तश्रुत गमिक-ग्रगभिक, अंगप्रविष्ट-अंगबाह्यश्रुत अंगप्रविष्ट श्रुत द्वादशांगी गणिपिटक 208 211 10 [32] Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org