________________ दसवां अध्ययन : स-भिक्षु] [377 इत्थीण वसं न यावि गच्छे : अभिप्रायः-चित्तसमाधि में सबसे बड़ा विध्न है स्त्रीसंगअर्थात्-तत्सम्बन्धी कामभोगों की अभिलाषा। इसलिए समाधिस्थ चित्त वाले भिक्षु के लिए गुण बताया है कि सर्वाधिक दुर्जेय स्त्रीसम्बन्धो कामभोगाभिलाषा के वशीभूत नहीं होता। ___वंतं नो पडियायइ-वान्त अर्थात्-वमन किये (त्यागे हुए) विषयभोगों को नो प्रत्यापिबति-पुनः नहीं पीता या नो प्रत्यादत्ते-पुनः ग्रहण-सेवन नहीं करता / ___ कठिन शब्दार्थ-सुनिसियं : सुनिशितं-सुतीक्ष्ण / रोइय-रुचि-श्रद्धा रख कर / पंचासवसंवरे-पांच इन्द्रियां पंचास्रबद्वार हैं, अथवा हिंसादि पांच प्रास्रव हैं, उन पांच आस्रवों को रोकता है / अत्तसमे मनिज्ज छप्पिकाए-छहकाय के जीवों को आत्मवत् मानता है, अर्थात-उनके सुख-दुःख, जीवन-मरण को अपने समान समझता है। पंचमहन्वयाई फासे-पांच महाव्रतों का स्पर्श-पालन करता है। अनिलेण-पंखे आदि वायूव्यंजक साधन से / पुढवि न खणे० इत्यादि का आशय–सचित्त पृथ्वी में जीव है, इसी प्रकार सचित्त जल, अग्नि, वायु एवं वनस्पति में जीव है, इनकी हिंसा विविध प्रकार से हो जाती है, जिसका विस्तृत वर्णन चतुर्थ अध्ययन में किया गया है। यहाँ पृथ्वी को न खोदे, सचित्त जल न पीए, अग्नि न जलाए, पखे आदि से हवा न करे, हरी वनस्पति को न छेदे, इत्यादि इन पांच स्थावरों (एकेन्द्रिय जीवों) की हिंसा करने कराने के एक-एक प्रकार का निषेध किया गया है। अर्थात् यहाँ पृथ्वी आदि प्रत्येक स्थावर जीव के साथ उसके एक प्रकार का और एक ही क्रिया से हिंसा-निषेध का संकेत किया गया है / शास्त्रकार का तात्पर्य यह है कि पृथ्वीकायादि जीवों से सम्बन्धित कोई भी ऐसी क्रिया न करनीकरानी चाहिए, जिससे उनका वध हो / सद्भिक्षु : श्रमणचर्या में सदा जागरूक 526. चत्तारि वमे सया कसाए, धुवजोगी य हवेज्ज बुद्धवयणे। अहणे निज्जाय-रूव-रयए, गिहिजोगं परिवज्जए जे, स भिक्खू // 6 // 3. चित्त-समाधाण-विग्धभूता विसया तत्थवि पाहण्णेण इत्थिगतत्ति भणति इत्थीण वसं / -अगस्त्य चूणि. 4. पडियायई-प्रत्यापिबति, प्रत्यादत्त-दसवेयालियं (न. म.) प्र. 479 5. (क) जधा खग्ग-परसु-छुरिगादि-सत्थमणधारं छेदगं तथा समततो दहणरूवं / 'पंचासवदाराणि इंदियाणि ताणि पासवा चेव तानि संवरे / ' -अ. चू. (ग) पंचाश्रवसंवतश्च द्रब्यतो पंचेन्द्रियसंवृतश्च ।-हा. वृ., प. 265 सेवते महाव्रतानि ।'-हा. वृ., प. 265 (घ) दसव्यालियं (मुनि नथमलजी) प्र. 487 (ङ) अनिलेन = अनिलहेतुना चेलकर्णादिना / हा. वृ., प, 265 6. (क) पुढवी चित्तमंतमक्खाया. इत्यादि पाठ। -दशव. अ. 4 (ख) दसवेयालियं (मुनि नथमलजी) पृ 485-486 (ग) सचित्तग्गहणेण सव्वस्स पत्तैय-साहारणस्स सभेदस्स वणफइकायस्स गहणं कयं, तं सचित्तं नो ग्राहारेज्जा। -जिन. चूणि., पृ. 341 Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org