________________ [सूर्यप्रशप्तिसूत्र एगे पुण एवमाहंस-- ता चक्कद्धचक्कवालसंठिया बंदिम-सूरियसंठिती पण्णत्ता, एगे एवमाहंसु / 8. एगे पुण एवमाहंसु ता छतागारसंठिया चंदिम-सरियसंठिती पण्णत्ता, एगे एक्माहंस / 6. एगे पुण एघमाहंसु ता गेहसंठिया चंदिम-सूरियसंठिती पण्णता, एगे एबमाहंसु / 10. एगे पुण एवमाहंसु__ता गेहावणसंठिया चंदिम-सूरियसंठिती पण्णत्ता, एगे एवमाहंसु, 11. एगे पुण एवमाहंसु___ता पासायसंठिया चंदिम-सूरियसंठिती पण्णत्ता, एगे एवमाहंसु, 12. एगे पुण एवमासु ता गोपुरसंठिया चंदिम-सरियसंठिती पण्णत्ता, एगे एवमाहंसु, 13. एगे पुण एवमाहंसु ता पेच्छाघरसंठिया चंदिम-सूरियसंठिती पण्णत्ता, एगे एवमाहंसु, 14. एगे पुण एवमाहंसु ता वलभीसंठिया चंदिम-सूरियसंठिती पण्णत्ता, एगे एवमाहंसु, 15. एगे पुण एवमाहंसु ता हम्मियतलसंठिया चंदिम-सूरियसंठितो पण्णता, एगे एवमाहंसु, १६.-एगे पुण एवमाहंसु ता बालग्गपोतियासंठिया' चंदिम-सूरियसंठिती पण्णसा, एगे एवमाहंसु / तत्थ जे ते एवमाहंसुता समचउरंस-संठिया चंदिम-सरियसंठिती पण्णता, एएणं गएणं यन्वं णो चेव णं इयरेहि / 1. बालाग्रपोतिका शब्दो देशीशब्दत्वादाकाशतडागमध्ये व्यवस्थितं क्रीडा-स्थानं लघुप्रासादम्। -सूर्य. वृत्ति 2. परतीथिकों की इन सोलह प्रतिपत्तियों में से केवल एक प्रतिपत्ति सूत्रकार की मान्यतानुसार है-इस विषय में वत्तिकार का कथन यह है-- 'तत्थेत्यादि-तत्र तेषां षोडशानां परतीथिकानां मध्ये ये ते वादिन एवमाहः---समचतुरस्रसंस्थिता चन्द्रसूर्यसंस्थिति: प्रज्ञप्ता इति, एतेन नयेन नेतन्यं, एतेनाभिप्रायेणास्मन्मतेऽपि चन्द्र-सूर्यसंस्थितिरवधार्येति भावः, तथाहि----'इह सर्वेऽपि काल विशेषा: सुषमसुषमादयो युगमूलाः / (शेष अगले पृष्ठ पर Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org