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________________ 26] [सूर्यप्राप्तिसूत्र सहस्समायाम-विक्खंभेणं, तिणि जोयणसयसहस्साई, दोणि य सत्तावीसे जोयणसए, तिणि कोसे, अट्ठावीसं च धणुसयं, तेरस य अंगुलाई. अद्धंगुलं च किचि विसेसाहिए परिक्खेवेणं पण्णत्ते, 1. ता जया गं सूरिए सव्वन्भंतरं मंडलं उवसंकमित्ता चारं चरइ, तया णं सा मंडलक्या अडयालीसं एगट्ठिभागे जोयणस्स बाहलेणं, णवणउइ जोयणसहस्साइं छच्च चत्ताले जोयणसयाई आयाम-विक्खंमेणं, तिष्णि जोयणसयसहस्साई पण्णरस जोयणसहस्साई एगणणउई जोयणाइं किंचि विसेसाहिए परिक्खेवेणं, तथा णं उत्तमकट्ठपत्ते उक्कोसए अट्ठारसमुहुत्ते दिवसे भवइ, जहणिया दुवालसमुहत्ता राई भवइ। 2. से निक्खम्ममाणे सूरिए णवं संवच्छरं अयमाणे पढमंसि अहोरत्तसि अन्भितराणंतर मंडलं जवसंकमित्ता चार चरइ, ता जया णं सूरिए अभितराणंतरं मंडलं उवसंकमित्ता चारं चरइ, तया णं सा मंडलवया अडयालीसं एगठिभागे जोयणस्स बाहले णं, णवणउई जोयणसहस्साई छच्च पणयाले जोयणसए पणतीसं :च एट्ठिभागे जोयणस्स आयाम-विक्खंभेणं, तिण्णि जोयणसयसहस्साइं पण्णरस जोयणसहस्साइं एग चउत्तरं जोयणसयं किंचि विसेसूणं परिक्खेवणं, 1. सूर्यप्रज्ञप्ति तथा जम्बूद्वीपप्रजाप्ति के सूत्रों में सूर्यमण्डल का प्रायाम-विष्कम्भ कहा गया है किन्तु समवायांग सूत्र में केवल विष्कम्भ ही कहा गया है। इसका समाधान यह है कि वृत्ताकार का आयाम-विष्कम्भ सदा समान होता है, सूर्यमण्डल वृत्ताकार है, अत: केवल विष्कम्भ कहने से आयाम और विष्कम्भ दोनों समझ लेने चाहिए। सूर्यप्रज्ञप्ति में सूर्यमण्डल का बाहल्य एक योजन के इकसठ भागों में से अड़तालीस भाग जितना कहा गमा है। जम्बूद्वीपप्रज्ञप्ति में सूर्यमण्डल का बाहल्य एक योजन के इकसठ भागों में से चौवीस भाग जितना कहा गया है। इन दो प्रकार के बाहल्य प्रमाणों में से कौन सा बास्तविक है, यह शोध का विषय है। सूर्यप्रज्ञप्ति में सूर्यमण्डल का पायाम-विष्कम्भ और परिधि बाह्याभ्यन्तर मण्डलों की अपेक्षा अनियत है, ऐसा लिखा है किन्तु जम्बूद्वीपप्रज्ञप्ति में सूर्यमण्डल का आयाम, विष्कम्भ और परिधि अनियत नहीं लिखी है। जम्बूद्वीपप्रज्ञप्ति में सूर्यमण्डल का आयाम-विष्कम्भ और परिधि जो कही है वह आभ्यन्तर या बाह्यमण्डलों की है ? क्योंकि सूर्यप्रज्ञप्ति में कथित बाह्याभ्यन्तर मण्डलों के प्रायाम-विष्कम्भप्रमाणों में जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिकथित आयाम-विष्कम्भपरिधि का प्रमाण मिलता नहीं है। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.003484
Book TitleAgam 16 17 Suryaprajnapti Chandraprajnapti Sutra - Swe Mu Pu Agam 16 17
Original Sutra AuthorN/A
AuthorMadhukarmuni, Kanhaiyalal Maharaj, Shobhachad Bharilla
PublisherAgam Prakashan Samiti
Publication Year1989
Total Pages300
LanguagePrakrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size7 MB
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