SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 270
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ 220] [सूर्यप्रज्ञप्तिसूत्र २-दृष्टिपथ क्षेत्र का प्रमाण निकालने के लिये 1 मुहूर्त की गति को (सूर्य की) दिनमान के अर्धभाग से गुणा करने पर जो लन्धि आये वह दृष्टिपथ क्षेत्र का प्रमाण जानना चाहिये / -सूत्र 23 दूसरा प्राभृत समाप्त। सूत्र 24 सूर्य द्वारा प्रकाशमान क्षेत्र का प्रमाण जब सूर्य सर्वाभ्यंतरमंडल में वर्तमान होता है तब जंबूद्वीप के कल्पित पाँच चक्रवाल में से डेढ भाग प्रकाशित करता है और एक भाग अप्रकाशित होता है / जम्बूद्वीप में वर्तमान दोनों सूर्य की अपेक्षा पाँच चक्रवाल में से तीन भाग प्रकाशित करते हैं और दो भाग अप्रकाशित होते हैं / अर्थात् जम्बूद्वीप के कल्पित पाँच भाग में से तीन भाग दिन होता है और दो भाग रात्रि होती है / जम्बूद्वीप के 366 भाग की कल्पना करने पर 1 भाग (चक्रवाल) के 732 भाग होते हैं, : चक्रवाल के 2196 भाग होते हैं / अर्थात् 3660 भाग में से 2196 भाग का दिवस होता है 1464 भाग रात्रि होती है, अथवा दोनों सूर्य 60 मुहूर्त में 1 मंडल की परिक्रमा पूर्ण करते हैं / जम्बूद्वीप के पाँच चक्रवाल की कल्पना करने पर 1 चक्रवाल 12 मुहर्त्तात्मक होता है। 12 मुहूर्त का काल जम्बूद्वीप के 3660 भाग की कल्पना में 732 भागात्मक होता है। सर्वाभ्यंतर मंडल से सूर्य जब सर्वबाह्यमंडल की ओर गमन करता है तब प्रतिमंडल में अहोरात्र में 2 / 61 भाग हानि-वृद्धि होती है / सर्वाभ्यन्तर मंडल को कम करने पर सर्वबाह्य मंडल 183 वां पाता है। जिससे 18342 करने पर 366/61 भाग की हानि-वृद्धि अहोरात्र में होती है / अर्थात् 6 मुहर्त दिवस में हानि और रात्रि में वृद्धि होती है / दोनों सूर्य की अपेक्षा 12 मुहूर्त की हानि-वृद्धि होती है। सर्वबाह्यमंडल में सूर्य 1 भाग प्रकाशित करता है और डेढ़ भाग अप्रकाशित रहता है / पूर्व में बताये गये अनुसार एक-एक सूर्य की अपेक्षा 1 भाग दिवस और डेढ़ भाग रात्रि रहती है। दोनों सूर्य की अपेक्षा 2 भाग दिवस और तीन भाग रात्रि होती है / सर्वाभ्यन्तरमंडल में 3 भाग दिवस और 2 भाग रात्रि होती है / सर्वबाह्यमंडल में 2 भाग दिवस और 3 भाग रात्रि होती है / 1 भाग 12 मुहूर्तात्मक जानना चाहिए। जम्बूद्वीप के 5 चक्रवाल की परिकल्पना करने पर 1 चक्रवाल 12 मुहूर्तात्मक होता है। क्योंकि दोनों सूर्य की अपेक्षा 60 मुहूर्त का काल 5 भागात्मक होता है। तीसरा प्राभृत समाप्त ।-सूत्र 24 समाप्त / Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.003484
Book TitleAgam 16 17 Suryaprajnapti Chandraprajnapti Sutra - Swe Mu Pu Agam 16 17
Original Sutra AuthorN/A
AuthorMadhukarmuni, Kanhaiyalal Maharaj, Shobhachad Bharilla
PublisherAgam Prakashan Samiti
Publication Year1989
Total Pages300
LanguagePrakrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size7 MB
JainGPT.orgInstagram
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy