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________________ 218] [सूर्यप्रज्ञप्तिसूत्र प्रत्येक मंडल की परिधि में व्यवहार से 18 योजन का अंतर होता है / अर्थात् सर्वाभ्यंतर मंडल की परिधि में 18 योजन मिलाने पर सर्वाभ्यंतरमंडल के अनन्तरवर्ती दूसरे में उसकी परिधि अाती है / तदनुसार दूसरे मंडल की परिधि में 18 योजन मिलाने पर तीसरे मंडल की परिधि पाती है। इस प्रकार प्रत्येक मंडल की परिधि ज्ञात की जा सकती है। प्रत्येक मंडल में सूर्य की एक मुहूर्त में कितनी गतिवृद्धि होती है, यह जानने के लिये इस सूत्र का उपयोग करना चाहिये प्रत्येक मंडल में परिधि की वृद्धि : 60 मुहूर्त / प्रत्येक मंडल में 18 योजन परिधि में वृद्धि होती है। उसे 60 मुहूर्त से भाग देने पर 1 मुहूर्त में होने वाली गतिवृद्धि प्राप्त होगी। 18 योजन प्रत्येक मंडल की परिधि में होने वाली वृद्धि : 60 मुहूर्त = 18 / 60 योजन 1 मुहूर्त में गति में वृद्धि होती है। सूर्य के दृष्टिपथ क्षेत्र का अंतर ज्ञात करने की विधि उस-उस मंडल में विद्यमान सूर्य दृष्टिपथ के क्षेत्र का अंतर ज्ञात करने के लिये निम्नलिखित सूत्र का उपयोग करना चाहिये सूर्य की उस-उस मंडल में एक मुहूर्त की गति 4 दिनमान का अर्धभाग। सर्वाभ्यन्तर मंडल में सूर्य के दृष्टिपथ क्षेत्र का प्रमाण 47263 योजन 21160 भाग है। उसको जानने के लिये उपर्युक्त सूत्र का उपयोग करने पर-५२५१ योजन 29 / 60 भाग। (सर्वाभ्यंतरमंडल में सूर्य की एक मुहूर्त की गति) x 9 मुहूर्त (दिनमान का अर्धभाग) 31508949 2835801 = 47263 योजन 21 / 60 भाग सर्वाभ्यंतर मंडल में सूर्य का दृष्टिपथ क्षेत्र है। सर्वाभ्यंतर मंडल में सूर्य का दृष्टिपथ क्षेत्रप्रमाण जानने की दूसरी विधि उस-उस मंडल की परिधि x दिनमान का अर्धभाग सर्वाभ्यंतरमंडल की परिधि दिनमान का अर्धभाग 315089-9 60 Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.003484
Book TitleAgam 16 17 Suryaprajnapti Chandraprajnapti Sutra - Swe Mu Pu Agam 16 17
Original Sutra AuthorN/A
AuthorMadhukarmuni, Kanhaiyalal Maharaj, Shobhachad Bharilla
PublisherAgam Prakashan Samiti
Publication Year1989
Total Pages300
LanguagePrakrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size7 MB
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