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________________ 170] [सूर्यप्रज्ञप्तिसूत्र मंदरपव्वयानो जोइसचारं 92. 1 प. ता मंदरस्स णं पव्वयस्स णं केवइयं अबाहाए जोइसे चारं चरइ ? उ. ता एक्कारस एक्कयोसे जोयणसए अबाहाए जोइसे चारं चरइ' / लोअंताओ जोइसठाणं प. ता लोअंताओ णं केवइयं प्रवाहाए जोइसे पण्णते ? उ. ता एक्कारस एक्कारे जोयणसए अबाहाए जोइसे पण्णत्ते / / गक्खत्ताणं अभंतराइं चारं 13. 1 प. ता जंबुद्दीवे णं दीवे कयरे णक्खत्ते सव्वन्भंतरिल्लं चारं चरइ ? 2 प. कयरे णक्खत्ते सव्वबाहिरिल्लं चारं चरइ ? 3 प. कयरे णक्खत्ते सव्ववरिल्लं चारं चरइ ? 4 प. कयरे णक्खत्ते सव्वहेटिल्लं चारं चरइ ? 1 उ. अभिई णक्खत्ते सव्वभंतरिल्लं चारं चरइ / छावट्ठीसहस्साइं, णव चेव सयाइं पंचसयराइं। एगससीपरिवारो, तारागणकोडिकोडीणं // ----जीवा. प. 3, उ. 2, सु. 194 ग: जीवाभिगम प्रति. 3, उ. 2, सू. 194 में--"चन्द्र और सूर्य दोनों के संयुक्त प्रश्नोत्तर हैं। मूल में प्रश्नसूत्र का केवल प्रतीक है और उत्तर के रूप में दो गाथाएँ हैं। ___टीका में-- "प्रश्नसूत्र का यह प्रतीक है- "एगमेगस्स णं भंते ! चंदिभ-सरियस्येत्यादि इस प्रतीक के सम्बन्ध में टीकाकर का स्पष्टीकरण यह है "एकैकस्य भदन्त ! चंद्र-सूर्यस्य" अनेन च पदेन यथा नक्षत्रादीनां चंद्र: स्वामी तथा सूर्यो: पि, तस्यापीन्द्रत्वात्.... ....इह भूयान पुस्तकेषु वाचनाभेदो गलितानि च सूत्राणि बहषु पुस्तकेष ततो यथावस्थित वाचनाभेदप्रतिपत्यर्थं गलितसूत्रोद्धरणार्थ चैवं सुगमान्यपि विवियन्ते.... 1. सम. स. 11, सु. 3 2. क. सम. स. 11, सु. 2 ख. जम्बु. वक्ख. 7, सु. 154 3. "सर्वाभ्यन्तरं सर्वेभ्यो मण्डलेभ्योऽभ्यन्तर: सर्वाभ्यन्तरः अनेन द्वितीयादि-मण्डल चारव्युदासः" "यद्यपि सर्वाभ्यन्तरमण्डलचारीग्यभिजिदादिद्वादशनक्षत्राण्यभिहितानि, तथापीदं शेषकादशनक्षत्रापेक्षया मेरुदिशि स्थितं सत चारं चरतीति सर्वाभ्यन्तरचारीत्यूक्तम्"। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.003484
Book TitleAgam 16 17 Suryaprajnapti Chandraprajnapti Sutra - Swe Mu Pu Agam 16 17
Original Sutra AuthorN/A
AuthorMadhukarmuni, Kanhaiyalal Maharaj, Shobhachad Bharilla
PublisherAgam Prakashan Samiti
Publication Year1989
Total Pages300
LanguagePrakrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size7 MB
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