________________ 126] [सूर्यप्रज्ञप्तिसूत्र अस्सिणी, 7. भरणी। 2. तत्थ गं जे ते एवमाहंसु(क) ता महादीया सत्त णक्खत्ता पुन्वदारिया पण्णत्ता, ते एवमाहंसु, तंजहा 1. महा, 2. पुन्वाफग्गुणी. 3. उत्तराफग्गुणी, 4. हत्थो, 5. चित्ता, 6. साती, 7. विसाहा, (ख) अणुराधादोया सत्त णक्खत्ता दाहिणदारिया पण्णत्ता, तंजहा-- 1. अणुराधा, 2. जेट्ठा, 3. मूले, 4. पुव्वासाढा, 5. उत्तरासाढा, 6. अभिई, 7. सवणे, (ग) धणिवादीया सत्त णक्खत्ता पच्छिमदारिया पण्णत्ता, तंजहा 1. धणिट्ठा, 2. सतभिसया, 3. पुन्वापोटुवया, 4. उत्तरापोटुवया, 5. रेवई, 6. अस्सिणी, 7. भरणी, (घ) कत्तियादीया सत्त णक्खत्ता उत्तरदारिया पण्णत्ता, तं जहा--- 1. कत्तिया, 2. रोहिणी, 3. संठाणा, 4. अद्दा, 5. पुणव्वसू, 6. पुस्सो, 7. अस्सेसा, 3. तत्थ गं जे ते एवमाहंसु(क) ता धणिवादीया सत्त णक्खत्ता पुब्वदारिया पण्णता ते एवमाहंसु, तंजहा 1. धणिट्ठा, 2. सतभिसया, 3. पुव्वापोडवया, 4. उत्तरापोट्टवया, 5. रेवई, 6. अस्सिणी, 7. भरणी,' (ख) कत्तियादीया सत्त णक्खत्ता दाहिणदारिया पण्णत्ता, तंजहा 1. कत्तिया 2. रोहिणी, 3. संठाणा, 4. अद्दा, 5. पुणव्वसू, 6. पुस्सो, 7. अस्सेसा, (ग) महादीया सत्त णक्खत्ता पच्छिमदारिया पण्णत्ता, तंजहा 1. महा, 2. पुब्बाफग्गुणी, 3. उत्तराफग्गुणी, 4. हत्थो, 5. चित्ता, 6. साई, 7. विसाहा, (घ) अणुराधादीया सत्त णक्खत्ता उत्तरदारिया पण्णत्ता, तंजहा 1. अणराहा, 2. जेट्टा, 3. मूलो, 4. प्रवासाढा, 5. उत्तरासाढा, 6. अभीयी, 7. सवणो। 1. (क) कत्तियाईया सत्त गक्खत्ता पुब्बदारिया पण्णत्ता, (ख) महाईया सत्त णवत्ता दाहिणदारिया एण्णत्ता, (ग) अणुराहाईया सत्त णक्खत्ता अवरदारिया पण्णत्ता, (घ) धणिटाइया सत्त णवखत्ता उत्तरदारिया पण्णत्ता / -सम. स. 7, सु. 8, 9, 10, 11 ये समवायांग के जो सूत्र यहाँ दिये गये हैं वे अन्य मान्यता के सूचक हैं किन्तु इन सूत्रों में ऐसा कोई वाक्य नहीं है जिससे सामान्य पाठक इन सूत्रों को अन्य मान्यता के जान सके / यद्यपि जैनागमों में नक्षत्र इल का प्रथम नक्षत्र अभिजित है और अन्तिम नक्षत्र उत्तराषाढा है, पर इसके अतिरिक्त भिन्न भिन्न कालों में परिवर्तित नक्षत्रमण्डलों के भिन्न भिन्न क्रमों का परिज्ञान आगमों के स्वाध्याय के बिना कैसे सम्भव हो? Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org