________________ 124] [सूर्यप्रज्ञप्तिसूत्र 4. लक्खणसंवच्छरस्स भेया ता लक्खणसंवच्छरे णं पंचविहे पण्णत्ते तंजहा–१. णक्खत्ते, 2. चंदे, 3. उडू, 4. आइच्चे, 5. अभिवट्टिए। 5. सणिच्छरसंवच्छरभेया क. ता सणिच्छरसंवच्छरे णं अट्ठावीसइविहे पण्णत्ते, तंजहा–१. अभियो, 2. सवणे, 3. धणिट्ठा, 4. सतभिसया, 5. पुव्वापोट्टवया, 6. उत्तरापोट्टवया, 7. रेवई, 8. अस्सिणी, 6. भरणी, 10. कत्तिय, 11. रोहिणी, 12. संठाणा, 13. अद्दा, 14. पुणव्वसू, 15. पुस्से, 16. अस्सेसा, 17. महा, 18. पुव्वाफग्गुणी, 19. उत्तराफग्गुणी, 20. हत्थे, 21. चित्ता, 22. साई, 23. विसाहा, 24. अणुराहा, 25. जेट्टा, 26. मूले, 27. पुन्वासाढा, 28. उत्तरासाढा / ख. जं वा सणिच्छरे महग्गहे तीसाए संवच्छरेहि सव्वं गक्खत्तमंडलं समाणेइ / गाहाओः१. णक्खत्तसंवच्छरलक्खण: समगं गक्खत्ता जोयं जोएंति, समगं उडू परिणमंति // मच्चुण्हं नाइसीए, बहु उदए होइ नवखत // 1 // 2. चंदसंवच्छरलक्खणः ससि समग पुण्णमासिं, जोईता विसमचारि णक्खत्ता / / कडुनो बहु उदगवओ, तमाहु संवच्छरं चंदं / / 2 // 3. उडु (कम्म) संवच्छरलक्खण: विसमं पवालिणो परिणमंति, अणउसु दिति पुष्फफलं // वासं न सम्म वासइ, तमाहु संवच्छरं कम्मं / / 3 // 4. आइच्चसंवच्छरलक्खणं:-- पुढवि-दगाणं च रसं, पुष्फ-फलाणं च देइ आइच्चे // अप्पेण वि वासेणं, सम्मं निप्फज्जए सस्सं // 4 // 5. अभिवुड्डियसंवच्छरलक्खणं प्राइच्चतेयतविया, खण-लव-दिवसा उऊ परिणमंति / / पूरेइ रेणु-थलयाई, तमाहु अभिवडिय जाण // 5 // 1. ठाणं. 5, उ. 3, सु. 460 2. ठाणं. 5, उ. 3, सु. 460 Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org