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________________ दशम प्राभृत--अष्टम प्राभूतप्राभृत] 26. प. ता मूले णक्खत्ते किसंठिए पग्णत्ते ? उ. विच्छ्यलंगोलसंठिए णग्णत्ते, 27. प. ता पुन्वासादा णक्खत्ते किसंठिए पण्णते ? उ. गविक्कम-संठिए पण्णत्ते, 28. प्र. ता उत्तरासाढा णक्खत्ते किसंठिए पणते ? उ. सीहनिसाइयसंठिए पण्णते।' 1. प. एएसिणं भंते ! अहावीसाए णक्खत्ताणं अभोई खत्ते किसठिए पण्णते ? उ. गायमा ! गोसोसावलिस ठिा पण्णते, गाहानो१. गोसीसावलि, 2. काहार, 3. सउणी, 4. पुष्फोबयार, 5-6. वावी य / 1. णावा, 8. प्रासखंधग, 9. भग, 10. छुरघरए, 11. अ संगडुद्धी / / 12. मिगसीसावली, 13. रुहिरबिंदु, 14. तुला, 15. बद्धमाणग, 16. पडागा / 17. पागारे, 18-19. पलिअंके, 20. हत्थे, 21. मुहल्लए चेव / / 22. खोलग, 23. दामणी, 24. एगावली य, 25. गयदंत, 26. विच्छुयलंगुले य / 27. गयविक्कमे य तत्तो, 28. सीहनिसीही य संठाणा // -जंबु. वक्ख. 7, सु. 160 मूर्यप्रशप्ति की वृत्ति में ये गाथाएं उद्धृत हैंपूर्वाभाद्रपद-उत्तराभाद्रपद के संस्थान तथा पूर्वाफाल्गुनी-उत्तराफाल्गुनी के संस्थान समान माने गए है किन्तु पूर्वाषाढा-उत्तराषाढा के संस्थान भिन्न भिन्न माने गए हैं। संस्थानों की इस विभिन्नता का हेतु इस प्रकार है:-- पूर्वभद्रपदाया:अर्द्धवापीसंस्थान, उत्तरभद्रपदाया अप्यर्धवापी संस्थानं, एतदर्द्धवापीद्वयमीलनेन परिपूर्णा वापी भवति, तेन सूत्रे वापीत्युक्तम् / पूर्वफल्गुन्या पद्धपल्यंकसंस्थान, उत्तरफलान्या अप्यर्धपत्यक संस्थान, अत्रापि अर्द्धपल्यंकद्वयमीलनेन परिपुर्ण कल्यंको भवति, तेन संख्यान्यूनता न / ---जंबु. वक्ख. 6, सु 160 वृत्ति Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.003484
Book TitleAgam 16 17 Suryaprajnapti Chandraprajnapti Sutra - Swe Mu Pu Agam 16 17
Original Sutra AuthorN/A
AuthorMadhukarmuni, Kanhaiyalal Maharaj, Shobhachad Bharilla
PublisherAgam Prakashan Samiti
Publication Year1989
Total Pages300
LanguagePrakrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size7 MB
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