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________________ 80] [सूर्यप्रज्ञप्तिसूत्र जोयं जोएसा जोयं अणुपरियट्टइ, जोयं अणुपरियट्टित्ता, सायं चंदं भरणोणं समप्पेइ। __8. ता भरणी खलु णक्खत्ते णत्तं भागे, 'अवडखेत्ते, पण्णरसमुहुत्ते तप्पढमयाए सायं चंदेण सद्धि जोयं जोएइ, नो लभइ अवरं दिवसं. एवं खलु भरणी णक्खत्ते एगं च राइं चंदेण सद्धि जोयं जोएइ, जोयं जोएत्ता जोयं अणुपरियट्टइ, जोयं अणुपरियट्टित्ता पाओ चंदं कत्तियाणं समप्पइ। 9. ता कत्तिया खलु णक्खत्ते पुव्वं भागे समक्खेत्ते तीसइ-मुहुत्ते तप्पढमयाए पाओ चंदेण सद्धि जोयं जोएइ, तओ पच्छाराई, एवं खलु कत्तिया णक्खत्ते, एगं च दिवस एगं च राई चंदेण सद्धि जोयं जोएइ, जोयं जोएता जोयं अणुपरियट्टइ, जोयं अणुपरियट्टित्ता पाओ चंदं रोहिणीणं समप्पेइ / 1. "योगमनपरिवर्त्य सायं परिस्फुटनक्षत्रमण्डलालोकसमये भरण्या: समर्पयति, इदं च भरणी नक्षत्रमुक्तयुक्त्या रात्री चन्द्रेण सह योगमुपैति, ततो नक्तं भागमवसेयम" 2. इसके आगे मूल प्रति में-"संक्षिप्तवाचना" का पाठ इस प्रकार है 10. "रोहिणी जहा उत्तराभवया", 11. मगसिरं जहा धणिट्ठा, 12. अद्दा जह सतभिसया, 13. पुणब्बसू जहा उत्तराभवया, 14. पुस्सो जहा धणिट्ठा, 15. असलेसा जहा सतभिसया, 16. महा जहा पुवाफग्गुणी, 17. पुव्वाफग्गुणी जहा पुन्वाभद्दवया, 18. उत्तराफम्गुणी जहा उत्तराभवया, 19.-20. हत्थो, चित्ता य जहा धणिट्ठा, 21. साती जहा सतभिसया, 22. विसाहा जहा उत्तराभवया, 23. अणुराहा जहा धणिट्ठा, 14. जिट्ठा जहा सतभिसया, 25. मूलो जहा पुब्वाभद्दवया, 26. पुवासादा जहा युव्वाभद्दवया 27. उत्तरासाढा जहा उत्तराभवया Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.003484
Book TitleAgam 16 17 Suryaprajnapti Chandraprajnapti Sutra - Swe Mu Pu Agam 16 17
Original Sutra AuthorN/A
AuthorMadhukarmuni, Kanhaiyalal Maharaj, Shobhachad Bharilla
PublisherAgam Prakashan Samiti
Publication Year1989
Total Pages300
LanguagePrakrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size7 MB
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