________________ सप्तम प्राभूत सूरियेण पगासिया पव्वया प.- ता कि ते सूरियं वरइ? आहिएत्ति वएज्जा। उ.---तत्थ खलु इमाओ वीसं पडिवत्तीओ पण्णत्ताओ तं जहातत्थेगे एवमाहंसु-.. 1. ता मंदरे णं पव्वए सरियं वरइ, एगे एक्माहंसु / एगे पुण एवमाहंसु२. ता मेरू णं पन्वए सरियं वरइ एगे एवमाहंसु / 3-16. एवं एएणं अभिलावेणं णेयध्वं तहेब जाव / ' एगे पुण एवमाहंसु२०. ता पन्वयराये णं पव्वए सूरियं वरइ, एगे एवमाहंसु / वयं पुण एवं वदामो ता मंदरे णं पव्वए सूरियं वरइ, एवं पि पवुच्चइ तहेव जाव (1-20 सूरिय० पा० 5, सु. 26 को देखें)। ता पव्वयराये गं पब्बए सूरियं वरइ, एवं पि पवुच्चइ / (क) ताजे गं पोग्गला सूरियस्स लेसं फुसंति, ते णं पुग्गला सूरियं वरयंति / (ख) अदिट्ठा वि णं पोग्गला सूरियं वरयंति / (ग) चरिमलेस्संतरगया वि गं पोग्गला सूरियं वरयति / 1. 'सूरियस्स लेस्सा पडिधायगा पन्वया' इस शीर्षक के अन्तर्गत सूर्य. प्रा. 5, सु. 26 में बीस प्रतिपत्तियों के अनुसार सूर्य की लेश्या को प्रतिहत करने वाले बीस पर्वतों के नाम गिनाये हैं। यहाँ भी उसी के अनुसार मूल-पाठ के सभी आलापक कहने चाहिए। 2. ऊपर के टिप्पण में सूचित शीर्षक के अन्तर्गत मर्य. पा. 5, सु. 26 के अनुसार सूर्यप्रज्ञप्ति के संकलनकर्ता ने यहाँ भी मंदर पर्वत के बीस नामों को पर्यायवाची मानकर समन्वय कर लिया है। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org