________________ छठा प्राभूत एगे पुण एवमाहंसु-- 24. ता अणुसागरोवम-सयसहस्समेव सरियस्स ओया अण्णा उप्पज्जइ, अण्णा अवेइ, एगे एवमाहंसु / एगे पुण एवमाहंसु२५. ता अणुउस्सप्पिणि-ओस प्पिणिमेव सूरियस्स ओया अण्मा उप्पज्जइ, अण्णा अवेइ, एगे एवमाहंसु / ' वयं पुण एवं वयामो-- (क) ता तीसं तीसं मुहुत्ते सूरियस्स ओया अवट्ठिया भवइ तेण परं सूरियस्स ओया अणट्टिया भवइ / (ख) छम्मासे सरिए प्रोयं णिव्वुड्ड। छम्मासे सरिए ओयं अभिवुड्डइ / (ग) निक्खममाणे सूरिए देसं णिन्वुड्डई / पविसमाणे सरिए देसं अभिवुड्ड। प.-तत्थ को हेऊ ? आहिए ति वएज्जा / उ.--ता अयं णं जंबद्दोवे दोवे सव्वदीव-समुद्दाणं सम्वन्भंतराए सव्व खड्डागे व जाव जोयणसयसहस्समायाम-विक्खंभे गं तिणि जोयणसयसहस्साई, दोणि य सत्तावीसे जोयणसए, तिणि कोसे, अट्ठावीसं च धणुसयं, तेरस य अंगुलाई अद्धंगुलं च किंचि विसेसाहिए परिक्खेवे णं पण्णते। 1. ता जया णं सूरिए सम्वन्भंतरं मंडलं उवसंकमित्ता चारं चरइ, तया मं उत्तमकट्ठपत्ते उक्कोसए अट्ठारसमुहत्ते दिवसे भवइ, जहणिया दुवालसमुहत्ता राई भवइ / 2. से निक्खममाणे सूरिए णवं संवच्छरं अयमाणे पढमंसि अहोरत्तंसि अभिंतराणंतरं मंडलं उवसंकमित्ता चारं चरइ। ता जया णं सूरिए अभिंतराणंतरं मंडलं उवसंकमित्ता चारं चरइ, तया गं एकाणं राईदिएणं एगं भागं ओयाए दिवसखित्तस्स निबुढित्ता रयणि-खित्तस्स अभिड्ढित्ता चारं चरइ, मंडलं अट्ठारसेहिं तीसे हि सर्वहिं छेत्ता। तया गं अट्ठारसमुहुत्ते दिवसे भवइ, दोहिं एगट्ठिभागमुहुत्तेहि ऊणे / 1. इन प्रतिपत्तियों से ऐसा प्रतीत होता है कि जैनागमों के अतिरिक्त अन्य दार्शनिक पुराणादि ग्रन्थों में भी प्रौपमिककालवाचक 'पल्योपम-सागरोपम, उत्सपिणी-अवसर्पिणी' आदि शब्दों का प्रयोग था। वर्तमान में भी यदि पूराणादि ग्रन्थों में इन प्रौपमिककाल वाचक शब्दों का कहीं प्रयोग हो तो अन्वेषणशील विद्वान् प्रयत्न करके प्रकाशित करें। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org