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________________ [प्रज्ञापनासूत्र क्रम-सर्वप्रथम वनस्पतिकाय के सूक्ष्म और बादर ये दो भेद, तदनन्तर सूक्ष्म के पर्याप्त और अपर्याप्त, ये दो प्रकार, फिर बादर के दो भेद-प्रत्येकशरीर और साधारणशरीर, तत्पश्चात् प्रत्येकशरीर के वृक्ष, गुच्छ प्रादि 12 भेद, क्रमशः प्रत्येक भेद के अन्तर्गत विविध वनस्पतियों के नामों का उल्लेख, तदनन्तर साधारणवनस्पतिकायिकों के अन्तर्गत अनेक नामों का उल्लेख तथा लक्षण एवं अन्त में उनके पर्याप्तक-अपर्याप्तक भेदों का वर्णन प्रस्तुत किया गया है / ' वृक्षादि बारह मेदों की व्याख्या-वृक्ष-जिसके आश्रित मूल, पत्ते, फूल, फल, शाखाप्रशाखा, स्कन्ध, त्वचा आदि अनेक हों, ऐसे आम, नीम, जामुन, आदि वृक्ष कहलाते हैं। वृक्ष दो प्रकार के होते हैं-एकास्थिक (जिसके फल में एक ही बीज या गुठली हो) और बहुबीजक (जिसके फल में अनेक बीज हों)। प्राम, नीम आदि वृक्ष एकास्थिक के उदाहरण हैं तथा बिजौरा, वट, दाडिम, उदुम्बर आदि बहुबीजक वृक्ष हैं / ये दोनों प्रकार के वृक्ष तो प्रत्येकशरीरी होते हैं, लेकिन इन दोनों प्रकार के वृक्षों के मूल, कन्द, स्कन्ध, त्वचा, शाखा और प्रवाल, असंख्यात जीवों वाले तथा पत्ते प्रत्येक जीव वाले और पुष्प अनेक जीवों वाले होते हैं / गुच्छवर्तमान युग की भाषा में इसका अर्थ है-पौधा। इसके प्रसिद्ध उदाहरण हैं--वृन्ताकी (बैंगन), तुलसी, मातुलिंगी आदि पौधे / गुल्म-विशेषत: फूलों के पौधों को गुल्म कहते हैं। जैसे--चम्पा, जाई, जूही, कुन्द, मोगरा, मल्लिका आदि पुष्पों के पौधे / लता--ऐसी बेलें जो प्रायः वृक्षों पर चढ़ जाती हैं, वे लताएँ होती हैं। जैसे—चम्पकलता, नागलता, अशोकलता आदि / वल्ली-ऐसी बेलें जो विशेषतः जमीन पर ही फैलती हैं, वेवल्लियां कहलाती हैं। उदाहरणार्थ-कालिगी की बेल), तुम्बी (तूम्बे की बेल), कर्कटिकी (ककड़ी की बेल), एला (इलायची की बेल) आदि / पर्वक-जिन वनस्पतियों में बीच-बीच में पर्व-पोर या गांठे हों, वे पर्वक वनस्पतियां कहलाती हैं। जैसे-इक्षु, सूठ, बेंत, आदि / तृण-हरी घास आदि को तृण कहते हैं, जैसे-कुश, अर्जुन, दूब आदि / बलय--वलय के आकार की गोल-गोल पत्तों वाली वनस्पति 'वलय' कहलाती है। जैसेताल (ताड़), कदली (केले) आदि के पौधे / ओषधि-जो वनस्पति फल (फसल) के पक जाने पर दानों के रूप में होती है, वह ओषधि कहलाती है। जैसे-गेहूँ, चावल, मसूर, तिल, मूग आदि / हरित-~-विशेषतः हरी सागभाजी को हरित कहते हैं--जैसे–चन्दलिया, वथुआ, पालक आदि / जलरह-जल में उत्पन्न होने वाली वनस्पति जलरुह कहलाती है। जैसे—पनक, शैवाल, पद्म, कुमुद, कमल आदि / कुहण-भूमि को फोड़ कर निकलने वाली वनस्पतियां कुहण कहलाती हैं। जैसे-छत्राक (कुकुरमुत्ता) आदि / प्रत्येकशरीरी अनेक जीवों का एक शरीराकार कैसे? प्रथम दृष्टान्त जैसे---पूर्ण सरसों के दानों को किसी श्लेषद्रव्य से मिश्रित कर देने पर वे बट्टी के रूप में एकरूप--एकाकार हो जाते हैं / यद्यपि वे सब सरसों के दाने परिपूर्ण शरीर वाले होने के कारण पृथक्-पृथक अपनी-अपनी अवगाहना में रहते हैं; तथापि श्लेषद्रव्य से परस्पर चिपक जाने पर वे एकरूप प्रतीत होते हैं, उसी प्रकार प्रत्येक शरीरी जीवों के शरीरसंघात भी परिपूर्ण शरीर होने के कारण पृथक-पृथक अपनी-अपनी 1. पण्णवणासुत्तं (मूलपाठ) भाग-१, पृ. 16 से 27 तक 2. प्रज्ञापनासूत्र मलय. वृत्ति, पत्रांक 30 से 32 तक Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.003483
Book TitleAgam 15 Upang 04 Pragnapana Sutra Stahanakvasi
Original Sutra AuthorShyamacharya
AuthorMadhukarmuni, Gyanmuni, Shreechand Surana, Shobhachad Bharilla
PublisherAgam Prakashan Samiti
Publication Year1983
Total Pages1524
LanguagePrakrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size37 MB
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