________________ 64] [प्रज्ञापनासूत्र (असंख्यात) निगोदों (के पृथक्-पृथक् शरीरों) का देखना शक्य नहीं है / (केवल) (अनन्त-) निगोदजीवों के शरीर ही दिखाई देते हैं / / 103 / / [11] लोगागासपएसे णिोयजीवं ठवेहि एक्केवक / एवं मवेज्जमाणा हवंति लोया प्रणता उ // 104 // लोगागासपएसे परित्तजीवं ठवेहि एक्केक्कं / एवं मविज्जमाणा हवंति लोया असंखेज्जा // 10 // पत्तेया पज्जत्ता पयरस्स असंखेभागमेत्ता उ। लोगाऽसंखाऽपज्जत्तगाण साहारणमर्णता // 106 // [एएहिं सरीरेहिं पच्चक्खं ते परूविया जीवा / सुहुमा प्राणागेज्झा चक्खुप्फासं ण ते एंति // 1 // ] [पक्खित्ता गाहा] जे यावण्णे तहप्पगारा। [54-11] लोकाकाश के एक-एक प्रदेश में यदि एक-एक निगोदजीव को स्थापित किया जाए और उनका माप किया जाए तो ऐसे-ऐसे अनन्त लोकाकाश हो जाते हैं, (किन्तु लोकाकाश तो एक ही है, वह भी असंख्यातप्रदेशी है।) // 104 / / एक-एक लोकाकाश-प्रदेश में, प्रत्येक वनस्पति काय के, एक-एक जीव को स्थापित किया जाए और उन्हें मापा जाए तो ऐसे-ऐसे असंख्यातलोकाकाश हो जाते हैं // 105 / / प्रत्येक वनस्पतिकाय के पर्याप्तक जीव धनीकृत प्रतर के असंख्यातभाग मात्र (अर्थात्-लोक के असंख्यातवें भाग में जितने आकाशप्रदेश हैं, उतने) होते हैं। तथा अपर्याप्तक प्रत्येक वनस्पतिकाय के जीवों का प्रमाण असंख्यात लोक के बराबर है; और साधारण जीवों का परिमाण अनन्तलोक के बराबर है / / 106 // [प्रक्षिप्त गाथार्थ] "इन (पूर्वोक्त) शरीरों के द्वारा स्पष्टरूप से उन बादरनिगोद जीवों की प्ररूपणा की गई है। सूक्ष्म निगोदजीव केवल आज्ञाग्राह्य (तीर्थंकरवचनों द्वारा ही ज्ञेय) हैं। क्योंकि ये (सूक्ष्मनिगोद जीव) आँखों से दिखाई नहीं देते / / 1 / / " अन्य जो भी इस प्रकार की (न कही गई) वनस्पतियां हों, (उन्हें साधारण या प्रत्येक वनस्पतिकाय में लक्षणानुसार यथायोग्य समझ लेनी चाहिए।) 55. [1] ते समासप्रो दुविहा पण्णत्ता / तं जहा-पज्जत्तगा य अपज्जत्तगा य / [55-1] वे (पूर्वोक्त सभी प्रकार के वनस्पतिकायिक जीव) संक्षेप में दो प्रकार के कहे गए हैं / वे इस प्रकार-पर्याप्तक और अपर्याप्तक / [2] तस्थ णं जे ते अपज्जत्तगा ते णं असंपत्ता / [55-2] उनमें से जो अपर्याप्तक हैं, वे असम्प्राप्त (अपने योग्य पर्याप्तियों को पूर्ण नहीं किये हुए) हैं। [3] तत्थ णं जे ते पज्जत्तगा तेसि वण्णादेसेणं गंधादेसेणं रसादेसेणं फासादेसेणं सहस्सग्गसो विहाणाई, संखेज्जाई जोणिप्पमुहसयसहस्साइं / पज्जत्तगणिस्साए अपज्जत्तगा वक्कमंति--जस्थ Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org