________________ वीसवाँ अन्तक्रियापद] [377 चक्रवर्ती के 14 रत्नों में से कोई भी एक रत्न, नारकी आदि सीधे कौन प्राप्त कर सकता है ? यह बताया गया है।' * अन्त में असंयम भव्यद्रव्यदेव, संयम-अविराधक, संयम-विराधक, संयमासंयम-अविराधक, संयमा संयम-विराधक, असंज्ञी (अकामनिर्जरायुक्त) तापस, कान्दपिक, चरक-परिव्राजक, किल्विषिक, तैरश्चिक, प्राजीवक, आभियोगिक, स्वलिंगी एवं दर्शनभ्रष्ट, इनमें से किसकी किन देवों में उत्पत्ति होती है, यह बताया गया है।' 1. पण्णवण्णामृतं भा. 1. पृ. 327 2. पण्णवण्णासुत्तं भा. 2, पृ. 165-166 Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org