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________________ 48] [प्रज्ञापनासूत्र 37. से किं तं बादरवणस्सइकाइया ? बादरवणस्सइकाइया दुविहा पण्णत्ता / तं जहा-पत्तेयसरीरबादरवणप्फइकाइया य साहारणसरीरबादरवणफइकाइया य / [37 प्र.] अब प्रश्न है-त्रादर वनस्पतिकायिक कैसे हैं ? [37 उ.] बादर वनस्पतिकायिक दो प्रकार के कहे गए हैं। वे इस प्रकार--प्रत्येकशरीरबादरवनस्पतिकायिक और साधारणशरीर बादरवनस्पतिकायिक / 38 से कि तं पत्तयसरीरबादरवणप्फइकाइया? पत्तेयसरीरबादरवणप्फइकाइया दुवालसविहा पन्नत्ता / तं जहारुक्खा 1 गुच्छा 2 गुम्मा 3 लता य 4 वल्ली य 5 पव्वगा चेव 6 / तण 7 वलय 8 हरिय 6 प्रोसहि 10 जलरुह 11 कुहणा य 12 बोद्धन्वा // 12 // [38 प्र] वे प्रत्येकशरीर-बादरवनस्पतिकायिक जीव किस प्रकार के हैं ? [38 उ. प्रत्येकशरीरबादरवनस्पतिकायिक जीव बारह प्रकार के कहे गए हैं। वे इस प्रकार से हैं-(१) वृक्ष (आम, नीम आदि), (2) गुच्छ (बैंगन आदि के पौवे), (3) गुल्म (नवमालिका आदि), (4) लता (चम्पकलता आदि), (5) वल्ली (कूष्माण्डी अपुषी आदि बेलें), (6) पर्वग (इक्षु आदि पर्व-पोर-गांठ वाली वनस्पति), (7) तृण (कुश, कास, दूब आदि हरी धास), (8) वलय (जिनकी छाल वलय के आकार की गोल होती है, ऐसे केतकी, कदली अादि), (9) हरित (बथना आदि हरी लिलोती), (10) औषधि (गेहूँ आदि धान्य, जो फल (फसल) पकने पर सूख जाते हैं।), (11) जलरुह (पानी में उगने वाली कमल, सिंघाड़ा, उदकावक आदि बनस्पति) और (12) कुहण (भूमि को फोड़ कर उगने वाली वनस्पति), (ये बारह प्रकार के प्रत्येकशरीर-बादरवनस्पतिकायिक जीव) समझने चाहिए। 39. से कि तं रक्खा ? रुक्खा दुविहा पन्नत्ता / तं जहा—एगडिया य बहुबीयगा य / [36 प्र.] वे वृक्ष किस प्रकार के हैं ? [36 उ.] वृक्ष दो प्रकार के कहे गए हैं-एकास्थिक (प्रत्येक फल में एक गुठली या बीज वाले) और बहुबीजक (जिनके फल में बहुत बीज हों)। 40. से कि तं एगढिया ? एगट्ठिया प्रणेगविहा पण्णत्ता / तं जहा णिबंब जंबु कोसंब साल अंकोल्ल पीलु सेलू य / सल्लइ मोयइ मालुय बउल पलासे करंजे य // 13 // पुत्तंजीवयारिठे बिभेलए हरडए य भल्लाए। उंबेभरिया खीरिणि बोधव्वे धायइ पियाले // 14 // Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.003483
Book TitleAgam 15 Upang 04 Pragnapana Sutra Stahanakvasi
Original Sutra AuthorShyamacharya
AuthorMadhukarmuni, Gyanmuni, Shreechand Surana, Shobhachad Bharilla
PublisherAgam Prakashan Samiti
Publication Year1983
Total Pages1524
LanguagePrakrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size37 MB
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