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________________ प्रथम प्रशापनापद [39 मृत्तिका (कालो मिट्टी), (2) नीलमृत्तिका (नीले रंग की मिट्टी), (3) लोहितमृत्तिका (लाल रंग की मिट्टी), (4) हारिद्रमृत्तिका (पीली मिट्टी), (5) शुक्लमृत्तिका (सफेद मिट्टी), (6) पाण्डुमृत्तिका (पाण्डु-मटमैले रंग की मिट्टी) और (7) पनकमृत्तिका (काई-सी हरे रंग की मिट्टी)। 24. से कि तं खरबादरपुढविकाइया ? खरबादरपुढविकाइया प्रणेगविहा पण्णत्ता / तं जहापुढवी य 1 सक्करा 2 वालुया य 3 उवले 4 सिला य 5 लोणूसे 6-7 / प्रय 8 तंब 9 तउय 10 सोसय 11 रुप्प 12 सुवण्णे य 13 बइरे य 14 // 8 // हरियाले 15 हिंगुलुए 16 मणोसिला 17 सासगंजण 15-16 पवाले 20 / अन्भपडल 21 भवालुय 22 बाबरकाए मणिविहाणा // 6 // 'गोमेज्जए य 23 रुपए 24 अंके 25 फलिहे य 26 लोहियक्खे य 27 / मरगय 28 मसारगल्ले 26 भुयमोयग 30 इंदनोले य 31 // 10 // चंदण 32 गेरुय 33 हंसे 34 पुलए 35 सोगंधिए य 36 बोद्धव्वे / चंदप्पम 37 वेरुलिए 38 जलकते 36 सूरकते य 40 // 11 // जे यावऽण्णे तहप्पगारा। [२४-प्र.] खर बादरपृथ्वीकायिक कितने प्रकार के हैं ? [24 उ.] खर बादरपृथ्वीकायिक अनेक प्रकार के कहे गए हैं / वे इस प्रकार-(१) पृथ्वी, (2) शर्करा (कंकर), (3) बालुका (बालू-रेत), (4) उपल (पाषाण - पत्थर), (5) शिला (चट्टान), (6) लवण (सामुद्र, सैंचल आदि नमक), (7) अष (ऊपर-क्षार वाली जमीन, बंजरभूमि), (8) अयस् (लोहा), (9) ताम्बा, (10) वपुष् (रांगा), (11) सीसा, (12) रौप्य (चांदी), (13) सुवर्ण (सोना), (14) वज्र (हीरा), (15) हड़ताल, (16) हींगलू (17) मैनसिल, (18) सासग (पारदपारा), (19) अंजन (सौवीर आदि), (20) प्रवाल (मूगा), (21) अभ्रपटल (अभ्रक-भोड़ल) (22) अभ्रवालुका (अम्रक-मिश्रित बालू), बादरकाय में मणियों के प्रकार--(२३) गोमेज्जक (गोमेदरत्न), (24) रुचकरत्न, (25) अंकरत्न. (26) स्फटिकरत्न, (27) लोहिताक्षरत्न, (28) मरकतरत्न, (26) मसारगल्ल रत्न, (30) भुजमोचकरत्न, (31) इन्द्रनीलमणि, (32) चन्दनरत्न, (33) गैरिकरत्न, (34) हंसरत्न (हंसगर्भ रत्त), (35) पुलकरत्न, (36) सौगन्धिकरत्न, (37) चन्द्रप्रभरत्न, (38) वैडूर्यरत्न, (39) जलकान्तमणि और (40) सूर्यकान्तमणि / / 8-6-10-11 // 1. 'गोमेज्जए य 23 रुयगे 24 अंके 25 फलिहे य 26 लोहियक्खे य 27 / चंदण 28 गेरुय 29 हंसग 30 भुयमोय 31 मसारगल्ले य 32 // 7 // चंदप्पह 33 वेरुलिए 34 जलकते 35 चेव सूरकते य 36 / एए खरपुढवीए नाम छत्तीसयं होइ॥७६॥' इस प्रकार प्राचारांग वृत्तिकार शीलांकाचार्य ने प्राचारांगनियुक्ति की गाथाओं द्वारा खरपृथ्वीकाय के 36 भेद गिनाए हैं, जबकि प्रज्ञापना में 40 भेद वर्णित हैं। उत्तराध्ययन सूत्र में प्रज्ञापना. के समान ही गाथाएँ Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.003483
Book TitleAgam 15 Upang 04 Pragnapana Sutra Stahanakvasi
Original Sutra AuthorShyamacharya
AuthorMadhukarmuni, Gyanmuni, Shreechand Surana, Shobhachad Bharilla
PublisherAgam Prakashan Samiti
Publication Year1983
Total Pages1524
LanguagePrakrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size37 MB
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