________________ 506 ] [ प्रज्ञापनासूत्र है / वृत्तिकार ने प्रत्येक गति के जीव में बाहुल्य से पाई जाने वाली संज्ञा का तथा तथारूप संज्ञासम्पन्न जीव की अल्पता या अधिकता का युक्तिपुरःसर कारण बताया है / ' * कुल मिला कर 13 सूत्रों (सू. 725 से 737 तक) में जीवतत्त्व से सम्बद्ध संज्ञाओं का प्रस्तुत पद में सांगोपांग विश्लेषण किया है / 10 (क) पण्णवणासृत्तं (परिशिष्ट और प्रस्तावना) भा. 2, पृ. 76-77 (ख) पण्णवणासुतं (मूलपाठ) भा. 1, पृ. 188-189 / (ग) जैन आगम साहित्य : मनन और मीमांसा पृ. 242 (घ) प्रज्ञापनासूत्र मलय. वृत्ति, पत्रांक 222 Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org