________________ 504 [प्रज्ञापनासूत्र जो स्वस्थ और सुखी अथवा प्राणायाम करने वाले योगी होते हैं, वे दीर्घकाल से श्वासोच्छ्वास लेते हैं, किन्तु अस्वस्थ और दुःखी या भोगी-जल्दी जल्दी श्वास लेते हैं / देवों में उत्तरोत्तर दीर्घकाल के अनन्तर उच्छवास-निःश्वास लेने का रहस्य-देवों में जो देव जितनी अधिक आयु वाला होता है, वह उतना ही अधिक सुखी होता है और जो जितना अधिक / होता है, उसके उच्छवास-निःश्वास का विरहकाल उतना ही अधिक लम्बा होता है, क्योंकि उच्छ्वास-निःश्वासक्रिया दुःखरूप है। इसलिए देवों में जैसे जैसे आयु के सागरोपम में वृद्धि होती है, उतने-उतने श्वासोच्छ्वासविरह के पक्षों में वृद्धि होती जाती है।' / / प्रज्ञापनासूत्र : सप्तम उच्छ्वासपद समाप्त / / सूखी 1. प्रज्ञापनासूत्र म. वृत्ति, पत्रांक 220-221 Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org