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________________ पांचवां विशेषपद (पर्यायपद)] [429 [2] एवं उक्कोसगुणकालए वि / [543-2] इसी प्रकार उत्कृष्टगुण काले (अनन्तप्रदेशी स्कन्धों के पर्यायों के विषय में जानना चाहिए।) [3] अजहण्णमणुक्कोसगुणकालए वि एवं चेव / नवरं सहाणे छट्ठाणवड़िते। [543-3] इसी प्रकार (का पर्याय-विषयक कथन) मध्यमगुण काले (अनन्तप्रदेशी स्कन्धों का करना चाहिए।) 544. एवं नील-लोहित-हालिह-सुकिल्ल-सुभिगंध-दुन्भिगंध-तित्त-कडुय-कसाय-अंबिल-महुर. रसपज्जवेहि य बत्तव्वया भाणियन्वा। नवरं परमाणुपोग्गलस्स सुभिगंधस्स दुन्भिगंधो न भणति, दुभिगंधस्स सुन्भिगंधो न भण्णति, तित्तस्स अवसेसा ण भण्णंति / एवं कडुयादीण वि / सेसं तं चेव / [544] इसी प्रकार नील, रक्त, हारिद्र (पीत), शुक्ल (श्वेत), सुगन्ध, दुर्गन्ध, तिक्त (तीखा), कटु, काषाय, आम्ल (खट्टा), मधुर रस के पर्यायों से भी अनन्तप्रदेशी स्कन्धों की पर्याय सम्बन्धी वक्तव्यता कहनी चाहिए / विशेष यह है कि सुगन्ध वाले परमाणुपुद्गल में दुर्गन्ध नहीं कहा जाता और दुर्गन्ध वाले परमाणुपुद्गल में सुगन्ध नहीं कहा जाता / तिक्त (तीखे) रस वाले में शेष रस का कथन नहीं करना चाहिए, कटु आदि रसों के विषय में भी ऐसा ही समझना चाहिए। शेष सब बातें उसी तरह (पूर्ववत्) ही हैं। 545. [1] जहण्णगुणकक्खडाणं प्रणतपएसियाणं पुच्छा। गोयमा ! प्रणेता। से केण?णं? गोयमा! जहण्णगुणकक्खडे अणंतपएसिए जहष्णगुणकक्खडस्स अणंतपदेसियस्स दवट्ठयाए तुल्ले, पदेसट्ठयाए छठ्ठाणवडिते, प्रोगाहणट्ठयाए चउट्ठाणडिते, ठितीए चउट्ठाणवडिते, वण्णगंध-रसेहिं छट्ठाणवडिते, कक्खडफासपज्जवेहि तल्ले, अवसेसेहि सत्तफासपज्जवेहि छट्ठाणवडिते। [545-1 प्र.] भगवन् ! जघन्यगुणकर्कश अनन्तप्रदेशी स्कन्धों के कितने पर्याय कहे हैं ? [545-1 उ.] गौतम ! (उनके) अनन्त पर्याय (कहे हैं।) [प्र.] भगवन् ! किस आशय से आप ऐसा कहते हैं कि जघन्यगुणकर्कश अनन्तप्रदेशी स्कन्धों के अनन्त पर्याय हैं ? [उ.] गौतम ! एक जघन्यगुणकर्कश अनन्तप्रदेशी स्कन्ध, दूसरे जघन्यगुणकर्कश अनन्तप्रदेशी स्कन्ध से द्रव्य की अपेक्षा से तुल्य है, प्रदेशों की अपेक्षा से षट्स्थानपतित है, अवगाहना की अपेक्षा से चतु:स्थानपतित है, स्थिति की दृष्टि से चतुःस्थानपतित है एवं वर्ण, गन्ध एवं रस की अपेक्षा से षट्स्थानपतित है, कर्कशस्पर्श के पर्यायों की अपेक्षा से तुल्य है और अवशिष्ट सात स्पर्शो के पर्यायों की अपेक्षा से षट्स्थानपतित है / [2] एवं उक्कोसगुणकवखडे वि। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.003483
Book TitleAgam 15 Upang 04 Pragnapana Sutra Stahanakvasi
Original Sutra AuthorShyamacharya
AuthorMadhukarmuni, Gyanmuni, Shreechand Surana, Shobhachad Bharilla
PublisherAgam Prakashan Samiti
Publication Year1983
Total Pages1524
LanguagePrakrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size37 MB
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