SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 345
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ 312] [प्रतापनासूत्र 364. [1] सुहमवाउकाइयाणं पुच्छा / गोयमा ! जहण्णेण वि उक्कोसेण वि अंतोमुहत्तं / [364-1 प्र.] भगवन् ! सूक्ष्म वायुकायिक जीवों की स्थिति कितने काल तक की कही [364-1 उ.] गौतम ! (उनकी) जघन्य और उत्कृष्ट स्थिति अन्तर्मुहूर्त की है / [2] अपज्जत्तयसुहुमवाउकाइयाणे पुच्छा / गोयमा! जहण्णण वि उक्कोसेण वि अंतोमुहत्तं / [364-2 प्र.] भगवन् ! अपर्याप्त सूक्ष्म वायुकायिक जीवों की स्थिति कितने काल की कही [364-2 उ.] गौतम ! उनकी जघन्य स्थिति अन्तर्मुहूर्त की है और उत्कृष्ट (स्थिति) भी अन्तर्मुहूर्त की है। [3] पज्जत्तयाणं पुच्छा। गोयमा ! जहणेण वि उक्कोसेण वि अंतोमुहुत्तं / [364-3 प्र.] भगवन् ! पर्याप्तक सूक्ष्म वायुकायिक जीवों की स्थिति कितने काल तक की कही गई है ? [364-3 उ.] गौतम ! उनकी जघन्य एवं उत्कृष्ट स्थिति भी अन्तर्मुहूर्त की है। 365. [1] बादरवाउकाइयाणं पुच्छा। गोयमा ! जहण्णेणं अंतोमुहुत्तं, उक्कोसेणं तिनि वाससहस्साई / [365-1 प्र.] भगवन् ! बादर वायुकायिकों की कितने काल तक की स्थिति कही गई है ? [365-1 उ.] गौतम ! जघन्य अन्तर्मुहूर्त की और उत्कृष्ट तीन हजार वर्ष की है। [2] अपज्जत्तबादरवाउकाइयाणं पुच्छा। गोयमा! जहण्णेण वि उक्कोसेण वि अंतोमुत्तं / [365-2 प्र.] भगवन् ! अपर्याप्तक बादर वायुकायिक जीवों की स्थिति कितने काल तक को कही गई है ? [365-2 उ.] गौतम ! जघन्य और उत्कृष्ट स्थिति एक अन्तर्मुहर्त तक की होती है। [3] पज्जत्तयवादरवाउकाइयाणं पुच्छा। गोयमा ! जहण्णेणं अंतोमुहुत्तं, उक्कोसेणं तिणि वाससहस्साई अंतोमुत्तूणाई। [365-3 प्र.] भगवन् ! पर्याप्त बादर वायुकायिक जीवों की स्थिति कितने काल तक की कही गई है ? Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.003483
Book TitleAgam 15 Upang 04 Pragnapana Sutra Stahanakvasi
Original Sutra AuthorShyamacharya
AuthorMadhukarmuni, Gyanmuni, Shreechand Surana, Shobhachad Bharilla
PublisherAgam Prakashan Samiti
Publication Year1983
Total Pages1524
LanguagePrakrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size37 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy