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________________ 238]. [ प्रज्ञापनासूत्र हैं, क्योंकि वे असंख्यात लोकाकाश-प्रदेश-प्रमाण हैं। उनसे प्रत्येकशरीर बादर वनस्पतिकायिक असंख्यातगुणे हैं, क्योंकि बादर तेजस्कायिक तो सिर्फ मनुष्यक्षेत्र में ही होते हैं जबकि प्रत्येकशरीर बादर वनस्पतिकायिकों का क्षेत्र उनसे असंख्यातगुणा अधिक है / प्रज्ञापनासूत्र के द्वितीय स्थानपद में बताया है कि स्वस्थान में 7 घनोदधि, 7 घनोदधिवलय, इसी तरह अधोलोक, ऊर्ध्वलोक, तिरछे लोक आदि में जहाँ-जहाँ जलाशय होते हैं, वहाँ सर्वत्र बादर वनस्पतिकायिक पर्याप्तकों के स्थान हैं। जहाँ बादर बनस्पतिकायिक पर्याप्तकों के स्थान है, वहीं इनके अपर्याप्तकों के स्थान होते हैं। अतः क्षेत्र असंख्यातगुणा होने से वे भी असंख्यातगुणे हैं। उनसे वादर निगोद असंख्यातगुणे हैं, क्योंकि वे अत्यन्त सूक्ष्म अवगाहनावाले होने के कारण जल में शैवाल आदि के रूप में सर्वत्र पाए जाते हैं। इनकी अपेक्षा बादर पृथ्वीकायिक असंख्यातगुणे हैं, क्योंकि वे आठों पथ्वियों में तथा विमानों, भवनों एवं पर्वतों आदि में विद्यमान हैं। बादर अप्कायिक उनसे भी अनन्तगुणे अधिक है, क्योंकि समुद्रों में जल की प्रचुरता होती है। उनकी अपेक्षा बादर वायुकायिक असंख्यातगुणे हैं, क्योंकि सभी पोली जगहों में वायु विद्यमान रहती है। उनसे बादर बनस्पतिकायिक अनन्तगुणे अधिक हैं, क्योंकि बादर निगोद में अनन्त जीव होते हैं। बादर जीव उनसे विशेषाधिक होते हैं, क्योंकि बादर द्वीन्द्रिय आदि सभी जीवों का उनमें समावेश होता है। 7-8. बादर अपर्याप्तकों तथा पर्याप्तकों का अल्पबहुत्व-बादर जीवों के अपर्याप्तकों एवं पर्याप्तकों के अल्पबहुत्व का क्रम भी प्रायः पूर्वसूत्र (सू. 242) के समान है। बादर पर्याप्तकों के अल्पबहुत्व में सिर्फ प्रारम्भ में अन्तर है-वहाँ सबसे अल्प बादर त्रसकायिक अर्याप्तक के बदले वादर तेजस्कायिक पर्याप्तक हैं। शेष सब पूर्ववत् ही है। इनके अल्पबहुत्व का स्पष्टीकरण भी पूर्ववत् समझ लेना चाहिए। 6. बादर पर्याप्तक-अपर्याप्तकों का पृथक-पृथक् अल्पबहुत्व-बादर जीवों में एक-एक पर्याप्तक के आश्रित असंख्येय बादर अपर्याप्तक उत्पन्न होते हैं। इस नियम से बादर जीवों, वादर पृथ्वीकायिकों आदि में सर्वत्र पर्याप्तकों से अपर्याप्तक असंख्यातगुणे अधिक होते हैं। 10. समदितरूप से बादर, बादर पृथ्वोकायिकादि पर्याप्तक-अपर्याप्तकों का अल्पबहुत्वसबसे कम बादर तेजस्कायिक पर्याप्तक हैं, बादर सकायिक पर्याप्तक उनसे असंख्यातगुण हैं, बादर त्रसकायिक अपर्याप्तक, बादर प्रत्येकवनस्पतिकायिक पर्याप्त, बादर निगोद पर्याप्तक, बादर पृथ्वीकायिक पर्याप्तक, बादर अप्कायिक पर्याप्तक एवं बादर वायुकायिक पर्याप्तक क्रमशः उत्तरोत्तर असंख्यगुणे हैं। इनके अल्पबहुत्व को पूर्वोक्त युक्तियों से समझ लेना चाहिए / उनसे बादर वनस्पतिकायिक पर्याप्तक अनन्तगुगे हैं, क्योंकि प्रत्येक बादरनिगोद में वे अनन्त-अनन्त होते हैं। उनकी अपेक्षा समुच्चय बादर पर्याप्त विशेषाधिक हैं, क्योंकि उनमें बादर तेजस्कायिक प्रादि सभी का समावेश हो जाता है। बादर पर्याप्तों की अपेक्षा बादर वनस्पतिकायिक अपर्याप्तक असंख्येयगुणे हैं, उनसे बादर अपर्याप्तक एवं बादर क्रमशः उत्तरोत्तर विशेषाधिक हैं, इसका कारण पूर्ववत् समझ लेना चाहिए। 11. समुच्चय में सूक्ष्म-बादरों का अल्पबहुत्व-(सू. 247 के अनुसार) सबसे कम बादर त्रसकायिक हैं, उसके बाद बादर वायुकायिकपर्यन्त बाद रगत विकल्पों का अल्पबहुत्व पूर्ववत् समझता चाहिए / तदनन्तर सूक्ष्म निगोदपर्यन्त सूक्ष्मगत विकल्पों का अल्पबहुत्व भी पूर्ववत् जान लेना चाहिए। उसके पश्चात बादर वनस्पतिकायिक अनन्तगूणे हैं, क्योंकि प्रत्येक बादरनिगोद में अनन्त-अनन्त जीव होते हैं। उनसे वादर अपर्याप्तक विशेषाधिक है, क्योंकि बादर तेजस्कायिक आदि का भी उनमें Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.003483
Book TitleAgam 15 Upang 04 Pragnapana Sutra Stahanakvasi
Original Sutra AuthorShyamacharya
AuthorMadhukarmuni, Gyanmuni, Shreechand Surana, Shobhachad Bharilla
PublisherAgam Prakashan Samiti
Publication Year1983
Total Pages1524
LanguagePrakrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size37 MB
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