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________________ द्वितीय स्थानपद ] [ 175 (सु. 196) तहेव एतेसि पि भाणितव्वं जाव प्रायरक्खदेवसाहस्सीणं अण्णेसि च बहूणं सोहम्मगकप्पवासीणं वेमाणियाणं देवाण य देवीण य प्राहेवच्चं पोरेवच्चं जाव (सु. 196) विहरति / [197-1 प्र.] भगवन ! पर्याप्त और अपर्याप्त सौधर्मकल्पगत देवों के स्थान कहाँ कहे हैं ? भगवन् ! सौधर्मकल्पगत देव कहाँ निवास करते हैं ? [197-1 उ.] गौतम ! जम्बूद्वीपनामक द्वीप में सुमेरु पर्वत के दक्षिण में, इस रत्नप्रभापृथ्वी के अत्यधिक सम एवं रमणीय भूभाग से ऊपर चन्द्र, सूर्य, ग्रह, नक्षत्र तथा तारकरूप ज्योतिष्कों के अनेक सौ योजन, अनेक हजार योजन, अनेक लाख योजन, बहुत करोड़ योजन और बहुत कोटाकोटी योजन ऊपर दूर जाने पर सौधर्म नामक कल्प कहा गया है / वह पूर्व-पश्चिम में लम्बा, उत्तर दक्षिण में विस्तीर्ण, अर्द्ध चन्द्र के आकार में संस्थित, अचियों-ज्योतियों की माला तथा दीप्तियों की राशि के समान वर्ण-कान्ति वाला है। उसकी लम्बाई और चौड़ाई असंख्यात कोटि योजन ही नहीं, बल्कि असंख्यात कोटाकोटि योजन की है, तथा परिधि भी असंख्यात कोटाकोटि योजन की है। वह सर्वरत्नमय है, स्वच्छ है, (इत्यादि सब वर्णन, ) यावत् 'प्रतिरूप है' तक सू. 166 के अनुसार (समझना चाहिए / ) उस (सौधर्मकल्प) में सौधर्मक देवों के बत्तीस लाख विमानावास हैं, ऐसा कहा गया है / वे विमान पूर्ण रूप से रत्नमय हैं, स्वच्छ हैं, (इत्यादि सब वर्णन) सू. 166 के अनुसार यावत् प्रतिरूप हैं, तक, समझना चाहिए। ___ इन विमानों के बिलकुल मध्यदेशभाग में (ठीक बीचोंबीच) पांच अवतंसक कहे गए हैं / वे इस प्रकार हैं-१ अशोकावतंसक, २-सप्तपर्णावतंसक, ३-चंपकावतंसक ४-चूतावतंसक और इन चारों के मध्य में ५-पांचयां सौधर्मावतंसक / ये अवतंसक पूर्णतया रत्नमय हैं, स्वच्छ हैं, यावत् 'प्रतिरूप हैं' तक सब वर्णन सू. 166 के अनुसार समझ लेना चाहिए / इन्हीं (अवतंसकों) में पर्याप्त और अपर्याप्त सौधर्मक देवों के स्थान कहे गए हैं / (वे स्थान) तीनों (पूर्वोक्त) अपेक्षाओं से लोक के असंख्यातवें भाग में हैं। उनमें बहुत से सौधर्मक देव निवास करते हैं, जो कि 'महद्धिक हैं' (इत्यादि शेष वर्णन) यावत् प्रभासित करते हुए ('पभासेमाणा') तक (सू. 196 के अनुसार) (पूर्ववत् कहना चाहिए।) वे वहाँ अपने-अपने लाखों विमानों का, अपने-अपने हजारों सामानिक देवों का, इस प्रकार जैसे औधिक (सामान्य) वैमानिकों के विषय में (सू 196 में) कहा है, वैसे ही इनके विषय में भी कहना चाहिए / यावत् हजारों प्रात्मरक्षक देवों का, तथा अन्य बहुत-से सौधर्मकल्पवासी वैमानिक देवों और देवियों का आधिपत्य, पुरोवत्तित्व इत्यादि यावत् विचरण करते हैं ('विहरंति') तक (सू. 166 के अनुसार) कहना चाहिए। [2] सक्के यऽत्थ देविदे देवराया परिवसति वज्जपाणी पुरंदरे सतक्कतू सहस्सखे मघवं पागसासणे दाहिणड्ढलोगाधिवती बत्तीसविमाणावाससतसहस्साधिवती एरावणवाहणे सुरिंदे परयंबरवस्थधरे प्रालइयमाल-मउडे णवहेमचारुचित्तचंचलकुडलविलिहिज्जमाणगंडे महिड्ढिए जाव (सु. 166) पभासेमाणे। से णं तत्थ बत्तीसाए विमाणावाससतसहस्साणं चउरासोए सामाणियसाहस्सीणं तायत्तीसाए तायत्तीसगाणं च उण्हं लोगपालाणं अट्ठण्हं अगमहिसोणं सपरिवाराणं तिण्हं परिसाणं सत्तण्हं अणियाणं सत्तण्हं अणियाधिवतीणं च उण्हं च उरासीईणं प्रायरक्खदेवसाहस्सोणं अण्णेसि च बहूणं सोहम्मगकप्पवासीणं वेमाणियाणं देवाण य देवीण य पाहेबच्चं पोरेवच्चं कुब्वमाणे जाव (सु. 166) विहरइ / Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.003483
Book TitleAgam 15 Upang 04 Pragnapana Sutra Stahanakvasi
Original Sutra AuthorShyamacharya
AuthorMadhukarmuni, Gyanmuni, Shreechand Surana, Shobhachad Bharilla
PublisherAgam Prakashan Samiti
Publication Year1983
Total Pages1524
LanguagePrakrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size37 MB
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