SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 89
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ प्रथम प्रतिपत्ति: पृथ्वीकाय का वर्णन] [45 चौड़ाई प्रमाण तथा संख्यातयोजन प्रमाण लम्बा दण्ड निकालता है और पहले बंधे हुए वैक्रिय नामकर्म के स्थूल पुद्गलों की परिशातना करता है / यह वैक्रियसमुद्घात है / 5. तेजससमुद्घात--तैजसशरीर नामकर्म को लेकर यह होता है / वैक्रिय समुद्धात की तरह यह भी जानना चाहिए / इसमें तैजसशरीर नामकर्म की बहुत निर्जरा होती है / 6. आहारकसमुद्घात-आहारकशरीर की रचना करते समय यह समुद्घात होता है। इसमें आहारकशरीर नामकर्म के बहुत से पुद्गलों की निर्जरा होती है। विधि वैक्रियशरीर की तरह जानना चाहिए। 7. केवलिसमुद्घात-जब केवली के आयुकर्म के दलिक कम रह जाते हैं और वेदनीय, नाम, गोत्र कर्म के दलिक विशेष शेष होते हैं, तब निर्वाण के अन्तर्मुहुर्त पहले केवली समुद्घात करते हैं। इसमें वेदनीय, नाम और गोत्र कर्म के बहुत सारे दलिकों की निर्जरा हो जाती है। इसमें आठ समय लगते हैं / प्रथम समय में दण्डरचना, द्वितीय समय में कपाट रचना, तीसरे समय में मन्थान, चौथे समय में सम्पूर्ण लोक में व्याप्ति, पांचवें समय में अन्तराल के प्रदेशों का संहरण, छठे समय में मन्थान का संहरण, सातवें समय में कपाट का संहरण और आठवें समय में दण्ड का संहरण कर केवली पुनः स्वशरीस्थ हो जाते हैं / इस प्रक्रिया से वेदनीय, नाम और गोत्र कर्म के दलिकों का प्रभूत शातन हो जाता है और वे आयुकर्म के दलिकों के तुल्य हो जाते हैं। बेदनादि छह समुद्घातों का समय अन्तर्मुहूर्त और केवलिसमुद्घात का काल पाठ समय मात्र है। - सूक्ष्म पृथ्वीकायिक जीवों में पूर्वोक्त सात समुद्घातों में से तीन समुद्घात होते हैं-वेदना, कषाय और मारणांतिक, शेष 4 समुद्धात नहीं होते / क्योंकि उनमें वैक्रिय, तेजस, आहारक और केवल लब्धि का अभाव है। 10. संजीद्वार-संज्ञा जिसके हो, वह संज्ञी है / यहाँ संज्ञा से तात्पर्य भूत, वर्तमान और भविष्यकाल का पर्यालोचन करने की शक्ति से है। विशिष्ट स्मरणादि रूप मनोविज्ञान वाले जीव संज्ञी हैं / उक्त मनोविज्ञान से विकल जीव असंज्ञी हैं। संज्ञा तीन प्रकार की कही गई हैं-१. दीर्घकालिकी संज्ञा, 2. हेतुवादोपदेशिकी और 3. दृष्टिवादोपदेशिकी। दीर्घकालिकी संज्ञा-भूतकाल का स्मरण, भविष्यकाल का चिन्तन और वर्तमान का प्रवृत्तिनिवत्तिरूप व्यापार, जिस संज्ञा द्वारा होता है, वह दीर्घकालिकी संज्ञा है / इसी संज्ञा को लेकर संजी-असंज्ञी का विभाग पागम में किया गया है / यह संज्ञा देव, नारक और गर्भज तिर्यंच मनुष्यों को होती है। हेतुवादोपदेशिकी-देहनिर्वाह हेतु इष्ट में प्रवृत्ति और अनिष्ट से निवृत्ति के लिए उपयोगी केवल वर्तमानकालिक विचार ही जिस संज्ञा से हो, वह हेतुवादोपदेशिकी संज्ञा है / यह संज्ञा द्वीन्द्रियादि में भी पाई जाती है / केवल एकेन्द्रियों में नहीं पाई जाती। दृष्टिवादोपदेशिकी--यहाँ दष्टि से मतलब सम्यग्दर्शन से है। इसकी अपेक्षा से क्षायोपशमिक आदि सम्यक्त्व वाले जीव ही संजी हैं / मिथ्यात्वी असंज्ञी हैं / Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.003482
Book TitleAgam 14 Upang 03 Jivabhigam Sutra Stahanakvasi
Original Sutra AuthorN/A
AuthorMadhukarmuni, Rajendramuni, Shobhachad Bharilla
PublisherAgam Prakashan Samiti
Publication Year1989
Total Pages736
LanguagePrakrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size19 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy