________________ 46 जीवाजीवामिगमसूत्र पन्नारसहभागेण य चंदं पन्नरसमेव तं वरइ / पन्नरसइभागेण य पुणो वि तं चेवतिक्कम // 19 // एवं बडइ चंदो परिहाणी एव होई चंदस्स। कालो वा जोण्हा वा तेणणुभावेण चंदस्स // 20 // अंतो मणुस्सखेत्ते हवंति चारोवगा य उववण्णा। पंचविहा जोइसिया चंदा सूरा गहगणा य // 21 // तेण परं जे सेसा चंदाइच्चगहतारनक्खत्ता। नत्थि गई न वि चारो अवट्ठिया ते मुणेयब्बा // 22 // दो चंदा इह दोवे चत्तारि य सागरे लवणतोए। धायइसंडे दोवे बारस चंदा य सूरा य // 23 // दो दो जंबुद्दीवे ससिसूरा दुगुणिया भवे लवणे। लावणिगा य तिगुणिया ससिसूरा धायइसंडे // 24 // धायइसंडप्पभिई उद्दि? तिगुणिया भवे चंदा / आइल्ल चंदसहिया अणंतराणंतरे खेत्ते // 25 // रिक्खग्गहतारगं दीवसमुद्दे जहिच्छ से नाउं / तस्स ससीहिं गुणियं रिक्खग्महतारगाणं तु // 26 // चंदाओ सूरस्स य सूरा चंदस्स अंतरं होई। पन्नास सहस्साइं तु जोयणाणं अणूणाई // 27 // सूरस्स य सूरस्स य ससिणो ससिणो य अंतरं होई। बहियारो मणुस्सनगरस जोयणाणं सयसहस्सं // 28 // सूरतरिया चंदा चंदंतरिया य दिणयरा दित्ता। चित्तंतरलेसागा सुहलेसा मंदलेसा य // 29 // अट्ठासीइं च गहा अट्ठावीसं च होंति नक्खत्ता। एगससिपरिवारो एतो ताराणं वोच्छामि // 30 // छावट्ठिसहस्साइं नव चेव सयाइं पंचसयराई। एगससिपरिवारो तारागणकोडिकोडोणं // 31 // बहियाओ मणुस्सनगस्स चंदसूराण अवट्ठिया जोगा। चंदा अभीइजुत्ता सूरा पुण होंति पुस्सेहिं // 32 // 177. (इ) नक्षत्र और ताराओं के मण्डल अवस्थित हैं। अर्थात् ये नियतकाल तक एक मण्डल में रहते हैं। (किन्तु इसका मतलब यह नहीं कि ये विचरण नहीं करते), ये भी मेरुपर्वत के चारों ओर प्रदक्षिणावर्तमण्डल गति से परिभ्रमण करते हैं / / 11 // चन्द्र और सूर्य का ऊपर और नोचे संक्रम नहीं होता (क्योंकि ऐसा हो जगत् स्वभाव है।) Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org