SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 514
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ तृतीय प्रतिपत्ति लवणसमुद्र की वक्तव्यता 154. जंबुद्दीवं णामं दीवं लवणे णामं समुद्दे पट्टे वलयागारसंठाणसंठिए सव्वो समंता संपरिक्खित्ता णं चिट्टइ। लवणे णं भंते ! समुद्दे कि समचक्कवालसंठिए विसमचक्कवालसंठिए ? गोयमा ! समचक्कवालसंठिए नो विसमचक्कवालसंठिए। लवणे गं भंते ! समुद्दे केवइयं चक्कवालविक्खंभेणं केवइयं परिक्खेवेणं पण्णते ? गोयमा ! लवणे णं समुद्दे दो जोयणसयसहस्साई चक्कवालविक्खंभेणं पण्णरस जोयणसयसहस्साई एगासीइसहस्साई सयमेगोणचत्तालोसे किंचिविसेसाहिए लवणोदहिणो चक्कवालपरिक्खेवेणं / से णं एक्काए पउमवरवेइयाए एगेण य वणसंडेण सव्वओ समंता संपरिक्खत्ते चिट्ठइ, रोहवि वण्णओ। साणं पउमवरवेदिया अद्धजोयणं उड्ड उच्चत्तेणं पंचधणुसयं विक्खंभेणं लवणसमुद्दसमियापरिक्खेवेणं, सेसे तहेव / से णं वनसंडे देसूणाई दो जोयणाई जाव वि हरई। लवणस्स णं भंते ! समुदस्स कति दारा पण्णता ? गोयमा ! चत्तारि दारा पण्णता, तं जहाविजए, वेजयंते, जयंते, अपराजिए। कहि णं भंते / लवणसमुदस्स विजए णामं दारे पण्णत्ते ? गोयमा! लवणसमुद्दस्स पुरथिमपेरते धायइखंडस्स दोवस्स पुरथिमद्धस्स पच्चत्थिमेणं सोप्रोदाए महाणईए उप्पि एत्थ णं लवणस्स समुदस्स विजए णामं दारे पण्णत्ते, अट्ठजोयणाई उड्ड उच्चत्तेणं चत्तारि जोयणाई विक्खंभेणं एवं तं चेव सव्वं जहा जम्बुद्दीवस्स विजए दारे' रायहाणी पुरथिमेणं अण्णंमि लवणसमुद्दे / / कहि णं भंते ! लवणसमुद्दे वेजयंते णामं दारे पण्णत्ते ? गोयमा! लवणसमुद्दे दाहिणपरंते धातइखंडस्स दाहिणद्धस्स उत्तरेणं सेसं तं चेव / एवं जयंते वि, णवरि सीयाए महाणईए उप्पि भाणियव्वं / एवं अपराजिए वि, गवरं दिसिभागो भाणियच्यो / लवणस्स णं भंते। समुद्दस्स दारस्स य दारस्स य एस णं केवइयं अबाहाए अंतरे पण्णत्ते ? गोयमा ! तिण्णेव सयसहस्सा पंचाणउई भवे सहस्साई। दो जोयणसय असीआ कोसं दारंतरे लवणे // 1 // जाव प्रबाहाए अंतरे पण्णत्ते। 1. विजयदारसरिसमेयंपि / 2. किन्हीं प्रतियों में यहां चारों द्वारों का पूरा वर्णन मूलपाठ में दिया हुआ है, परन्तु वह पहले कहा जा चुका है और टीकानुसारी भी नहीं है, अतएव उसका उल्लेख नहीं किया गया है। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.003482
Book TitleAgam 14 Upang 03 Jivabhigam Sutra Stahanakvasi
Original Sutra AuthorN/A
AuthorMadhukarmuni, Rajendramuni, Shobhachad Bharilla
PublisherAgam Prakashan Samiti
Publication Year1989
Total Pages736
LanguagePrakrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size19 MB
JainGPT.orgInstagram
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy