________________ 414] [जीवाजोवाभिगमसूत्र कर जहाँ नन्दापुष्करिणी है, वहां पाता है। नंदापुष्करिणी की प्रदक्षिणा करके पूर्व के द्वार से उसमें प्रवेश करता है। पूर्व के त्रिसोपानप्रतिरूपक से नीचे उतर कर हाथ-पांव धोता है और एक बड़ी श्वेत चांदी की मत्त हाथी के मुख की प्राकृति की विमलजल से भरी हुई भारी को ग्रहण करता है और वहाँ के उत्पल कमल यावत् शतपत्र-सहस्रपत्र कमलों को लेता है और नंदापुष्करिणी से बाहर निकल कर जिस ओर सिद्धायतन है उस ओर जाने का संकल्प किया (उधर जाने लगा)। 142. [2] तए णं तस्स विजयदेवस्स चत्तारि सामाणियसाहस्सीओ जाव अण्णे य बहवे वाणमंतरा देवा य देवीमो य अप्पेगइया उप्पलहस्थगया जाव (सयसहस्सपत्त) हत्थगया विजयं देवं पिट्ठओ पिट्ठओ अणुगच्छति / तए गं तस्स विजयस्स देवस्स बहवे आभिनोगिया देवा य देवीओ य कलसहत्थगया जाव धूवकडच्छयहत्थगया विजयं देवं पिट्टओ पिट्टओ अणुगच्छंति। तए णं से विजए देवे चउहि सामाणियसाहस्सीहिं जाव प्रणेहि य बहूहि वाणमंतरेहिं देवेहि य देवीहि य सद्धि संपरिक्डे सम्विड्डीए सव्वज्जुईए जाव णिग्घोसणादियरवेणं जेणेव सिद्धाययणे तेणेव उवागच्छइ, उवागच्छित्ता सिद्धायतणं अगप्पयाहिणीकरेमाणे करेमाणे पुरथिमिल्लेणं वारेणं अणुपविसइ, अणुपविसित्ता जेणेव देवच्छंदए तेणेव उवागच्छाई, उवागच्छित्ता आलोए जिणपडिमाणं पणामं करेइ, करिता लोमहत्थगं मेहति लोमहत्थगं गेण्हित्ता जिणपडिमाओ लोमहत्थएणं पमज्जति, पमज्जित्ता सुरभिणा गंधोदएणं व्हाणेइ हाणित्ता विश्वाए सुरमिगंधकासाइएणं गायाई लहेइ, लहिता सरसेणं गोसीसचंदणेणं गायाई अणुलिपह, अणुलिपित्ता जिणपडिमाणं अहयाई सेयाई दिवाई देवदूसजुयलाइ णियंसेइ, णियंसित्ता अग्गेहिं वरेहि य गंहि य मल्लेहि य अच्चेइ, अच्चित्ता पुष्फाहणं गंधारहणं मल्लारहणं वण्णारुणं चुण्णाहणं आभरणारहणं करेइ, करित्ता प्रासत्तोसत्त-विउल-बट्टवाधारियमल्लवामकला वं करेइ, करित्ता अच्छेहि सहेहिं (सेएहि) रययामरहिं अच्छरसातंदुलेहि जिणपडिमाणं पुरओ अट्ठमंगलए आलिहति सोस्थिय सिखिच्छ जाव दप्पणा, आलिहिता कयग्गाहगहियकरतलपम्मविप्पमुक्केणं वसद्धवण्णेणं कुसुमेणं मुक्कपुष्फ जोवयारकलियं करेइ, करेता चंदप्पभवइरवेरुलियविमलवंडं कंचणमणिरयणभत्तिचित्तं कालागुरुपवरकुदुरुक्कतुरुक्कधूवगंधुत्तमाणुविद्धं धूमदि विणिमुयंत वेरुलियामयं कईच्छुयं पग्गहित्तु पयत्तेणं धूवं दाऊण सत्तटुपयाइं ओसरइ ओसरित्ता जिणवराणं अट्ठसयविसुद्धगंथजुत्तेहि महावितेहि अत्थजुत्तेहिं अपुणरत्तेहिं संथुणइ, संणिसा वामं जाणु अंचेह, अंचित्ता दाहिणं जाणु धरणितलंसि णिवावेइ तिक्खुत्तो मुद्धाणं घराणियलंसि णमेई, णमित्ता ईसि पच्चुण्णमइ, पच्चुण्णमित्ता कडयतुडिययंभियाओ भयानो पडिसाहरइ, पडिसाहरित्ता करयलपरिग्गहियं सिरसावत्तं मत्थए अंजलि कट्ट एवं वयासी-'णमोत्णु णं अरिहंताणं भगवंताणं जाव सिद्धिगणामधेयं ठाणं संपत्ताणं' तिकट्ठ वंदति णमंसइ, वंदित्ता गमंसित्ता जेणेव सिद्धायतणस्स बहुमजसदेसभाए तेणेव उवागच्छइ, उवागच्छित्ता विश्वाए उदगधाराए अम्भुक्खइ, अम्मुक्खित्ता सरसेणं गोसीसचंदणेणं पंचंगुलितलेणं मंडलं आलिहइ, आलिहिता चच्चए क्लयइ, चच्चए बलइत्ता कयग्गाहगहियकरतलपग्भट्ठविमुक्केणं दसवण्णेणं कुसुमेणं मुक्कपुष्फयुजोवयारकलियं करेइ, करित्ता पूवं वलयह, दलइत्ता जेणेव सिद्धायतणस्स दाहिणिल्ले वारे तेणेव उवागच्छइ, उवागच्छित्ता लोमहत्थयं गेण्हइ, गेण्हित्ता Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org