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________________ प्रथम प्रतिपत्ति : मनुष्यों का प्रतिपादन] [103 लियाँ 64 होती हैं / ये एक दिन के अन्तर से भोजन करते हैं और 79 दिन तक सन्तान की पालना करते हैं। पांच हरिवर्ष और पांच रम्यकवर्ष क्षेत्रों में मनुष्यों की आयु दो पत्योपम की, शरीर की ऊँचाई दो कोस की होती है। ये वज्रऋषभनाराचसंहनन वाले और समचतुरस्रसंस्थान वाले होते हैं / दो दिन के अन्तर से पाहार की अभिलाषा होती है। इनके 128 पसलियाँ होती हैं / 64 दिन तक संतान की पालना करते हैं। पांच देवकुरु और पांच उत्तरकूरु क्षेत्र के मनुष्यों की आयु तीन पल्योपम की, ऊँचाई तीन कोस की होती है / इनके बनऋषभनाराचसंहनन और समचतुरस्रसंस्थान होता है / इनकी पसलियाँ 256 होती हैं, तीन दिन के अन्तर से आहार करते हैं और 49 दिन तक अपत्य-पालना करते हैं / अन्तर्दोपज–अन्तर् शब्द 'मध्य' का वाचक है / लवणसमुद्र के मध्य में जो द्वीप हैं वे अन्तर्वीप कहलाते हैं / ये अन्तर्वीप छप्पन हैं / इनमें रहने वाले मनुष्य अन्तर्वीपज कहलाते हैं। ये अन्तर्वीप हिमवान और शिखरी पर्वतों की लवणसमुद्र में निकली दाढानों पर स्थित हैं / जम्बूद्वीप में भरतक्षेत्र की सीमा पर स्थित हिमवान पर्वत के दोनों छोर पूर्व-पश्चिम लवणसमुद्र में फैले हुए हैं। इसी प्रकार ऐरवत क्षेत्र की सीमा पर स्थित शिखरी पर्वत के दोनों छोर भी लवणसमुद्र में फैले हुए हैं। प्रत्येक छोर दो भागों में विभाजित होने से दोनों पर्वतों के पाठ भाग लवणसमुद्र में जाते हैं। हाथी के दांतों के समान प्राकृति वाले हाने से इन्हें दाढा कहते हैं। प्रत्येक दाढा पर मनुष्यों की आबादी वाले सात-सात क्षेत्र हैं। इस प्रकार 847 = 56 अन्तर्वीप हैं। इनमें रहने वाले मनुष्य अन्तर्वीपज कहलाते हैं। हिमवान पर्वत से तीन सौ योजन की दूरी पर लवणसमुद्र में 300 योजन विस्तार वाले 1. एकोसक, 2. प्राभासिक, 3. वैषाणिक और 4. लांगलिक नामक चार द्वीप चारों दिशाओं में हैं। इनके आगे चार-चार सौ योजन दूरी पर चार सौ योजन विस्तार वाले 5. हयकर्ण, 6. गजकर्ण, 7. गोकर्ण और 8. शष्कुलोकर्ण नामक चार द्वीप चारों विदिशाओं में हैं। ___इसके आगे पांच सौ योजन जाने पर पांच सौ योजन विस्तार वाले 9. आदर्शमुख, 10. मेढमुख, 11. अयोमुख, 12. गोमुख नामक चार द्वीप चारों विदिशाओं में हैं। इनके आगे छह सौ योजन जाने पर छह सौ योजन विस्तार वाले 13. ह्यमुख, 14. गजमुख, 15. हरिमुख और 16. व्याघ्रमुख नामक चार द्वीप चारों विदिशाओं में हैं। इसके प्रागे सात सौ योजन जाने पर सात सौ योजन विस्तार वाले 17. अश्वकर्ण, 18. सिंहकर्ण, 19. अकर्ण और 20. कर्णप्रावरण नामक चार द्वीप चारों विदिशाओं में हैं। इनसे आठ सौ योजन आगे आठ सौ योजन विस्तार वाले, 21. उल्कामुख, 22. मेघमुख, 23. विद्युत्मुख और 23. अमुख नाम के चार द्वीप चारों विदिशाओं में हैं। इससे नौ सो योजन आगे नौ सौ योजन विस्तार वाले 25. घनदन्त, 26. लष्टदन्त, 27. गूढदन्त और 28. शुद्धदन्त नाम के चार द्वीप चारों विदिशाओं में हैं / ये सब अट्ठाईसों द्वीप जम्बूद्वीप की जगती से तथा हिमवान पर्वत से तीन सौ योजन से लगाकर नौ सो योजन दूर हैं। इसी तरह ऐरवत क्षेत्र की सीमा करने वाले शिखरी पर्वत की दाढों पर भी इन्हीं नाम वाले 28 द्वीप हैं / इस तरह दोनों तरफ के मिलकर छप्पन अन्तझैप होते हैं / इन अन्तर्वीपों में एक पल्यो Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.003482
Book TitleAgam 14 Upang 03 Jivabhigam Sutra Stahanakvasi
Original Sutra AuthorN/A
AuthorMadhukarmuni, Rajendramuni, Shobhachad Bharilla
PublisherAgam Prakashan Samiti
Publication Year1989
Total Pages736
LanguagePrakrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size19 MB
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