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________________ सूर्याभदेव का समवसरण में आगमन] जीव महारम्भ, महापरिग्रह, पंचेन्द्रय जीवों का वध और मांसाहार इन चार कारणों से नरकयोग्य कर्मों का उपार्जन करता है और नारक रूप में उत्पन्न होता है। इन चार कारणों से जीव तिर्यंचगति को प्राप्त करता है और तिर्यंचयोनि में उत्पन्न होता है-१ मायाचार, 2 असत्यभाषण, 3 उत्कंचनता-खुशामद या धूर्तता, 4 वंचनता-धोखा देना, ठगना। इन कारणों से जीव मनुष्ययोनि में उत्पन्न होते हैं-१. प्रकृतिभद्रता 2. प्रकृतिविनीतता 3. सानुक्रोशता-दयावृत्ति 4. अमत्सरता- ईर्ष्या का अभाव / इन कारणों से जीव देवों में उत्पन्न होते हैं--१. सरागसंयम, 2. संयमासंयम, 3. अकामनिर्जरा, 4 बालतप-अज्ञान अवस्था में तप करना। ___धर्म दो प्रकार का है-१. अगारधर्म 2. अनगारधर्म / अनगार धर्म का पालन वह जीव करता है जो सर्व प्रकार से मुडित होकर गृहस्थ अवस्था-घर का त्याग कर श्रमण-प्रव्रज्या को अंगीकार कर अनगार बनता है। सर्वप्राणातिपातविरमण, मृषावादविरमण, अदत्तादानविरमण, मैथुनविरमण, परिग्रहविरमण और रात्रिभोजनविरमण व्रत को स्वीकार करता है / इस धर्म के पालन करने में जो निम्रन्थ अथवा निर्गन्थी (साधु, साध्वी) प्रयत्नशील हो अथवा पालन करता हो बह अाज्ञा का आराधक होता है / अगारधर्म बारह प्रकार का बताया है-पांच अणुव्रत, तीन गुणवत, चार शिक्षाव्रत / पांच अणुव्रत इस प्रकार हैं-स्थूल प्राणातिपातविरमण, स्थूल मृषावादविरमण, स्थूल अदत्तादानविरमण, स्वदारसंतोष, इच्छा-परिग्रह की मर्यादा बांधना। तीन गुणव्रत इस प्रकार हैं---अनर्थदंडविरमण, दिग्वत, उपभोग-परिभोगपरिमाणवत / चार शिक्षाबत इस प्रकार हैं-- सामायिक, देशावकाशिक पौषधोपवास, अतिथि-संविभागवत और जीवनान्त के समय जो धारण किया जाता है एवं मरण निकट हो तब कषाय और काया को कृश करके प्रीतिपूर्वक जिसकी आराधना की जाती है ऐसा संलेखनाव्रत / यह बारह प्रकार का अगारसामायिक धर्म है। इस धर्म की शिक्षा में उपस्थित श्रावक या श्राविका आज्ञा के आराधक होते हैं / भगवान की इस देशना को सुनकर उस महती सभा में उपस्थित मनुष्यों में से अनेकों ने श्रमण दीक्षा ली, अनेकों ने पांच अणुव्रत, सात शिक्षाव्रत रूप बारह प्रकार का गृहीधर्म अंगीकार किया। शेष परिषदा ने अपने प्रमोदभाव को प्रकट करते हुए श्रमण भगवान् महावीर को वंदननमस्कार किया, और फिर कहा-हे भदन्त ! आप द्वारा सुप्राख्यात, सुप्रज्ञप्त, सुभाषित, सुविनीत, सुभावित निर्ग्रन्थप्रवचन अनुत्तर है। धर्म की व्याख्या करते हुए आपने उपशम-क्रोधादि की शांति का उपदेश दिया है, उपशम के उपदेश के प्रसंग में आपने विवेक का व्याख्यान किया है, विवेक की व्याख्या करते हुए आपने प्राणातिपात आदि से विरत होने का निरूपण किया है, विरमण का उपदेश Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.003481
Book TitleAgam 13 Upang 02 Rajprashniya Sutra Stahanakvasi
Original Sutra AuthorN/A
AuthorMadhukarmuni, Ratanmuni
PublisherAgam Prakashan Samiti
Publication Year1982
Total Pages288
LanguagePrakrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size8 MB
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