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________________ 192] [प्रश्नव्याकरणसूत्र : श्रु. 2, अ. 2 स्पष्ट तथा पहले बुद्धि द्वारा सम्यक् प्रकार से विचारित ही साधु को अवसर के अनुसार बोलना चाहिए। __ इस प्रकार अनुवीचिसमिति के निरवद्य वचन बोलने की यतना के योग से भावित अन्तरात्मा-प्राणी हाथों, पैरों, नेत्रों और मुख पर संयम रखने वाला, शूर तथा सत्य और आर्जव धर्म से सम्पन्न होता है। दूसरी भावना-अक्रोध १२३-बिइयं-कोहो ण सेवियन्वो, कुद्धो चंडिक्किओ मणूसो अलियं भज्ज, पिसुणं भज्ज, फरसं भज्ज, अलियं-पिसुणं-फरसं भणेज्ज, कलहं करिज्जा, बेरं करिज्जा, विकहं करिज्जा, कलह-वेरंविकहं करिज्जा, सच्चं हणेज्ज, सील हणेज्ज, विणयं हणेज्ज, सच्च-सोलं-विणयं हणेज्ज, वेसो हवेज्ज, वत्थु हवेज्ज, गम्मो हवेज्ज, वेसो-वत्थु-गम्मो हवेज्ज, एयं अण्णं च एवमाइयं भणेज्ज कोहग्गिसंपलित्तो तम्हा कोहो ण सेवियन्यो / एवं खंतीइ भाविओ भवइ अंतरप्पा संजयकर-चरण-णयणवयणो सूरो सच्चज्जवसंपण्णो। १२३–दूसरी भावना क्रोधनिग्रह-क्षमाशीलता है। (सत्य के आराधक को) क्रोध का सेवन नहीं करना चाहिए / क्रोधी मनुष्य रौद्रभाव वाला हो जाता है और (ऐसी अवस्था में) असत्य भाषण कर सकता है (या करता है)। वह पिशुन-चुगली के वचन बोलता है, कठोर वचन बोलता है / मिथ्या, पिशुन और कठोर--तीनों प्रकार के वचन बोलता है। कलह करता है, वैर-विरोध करता है, विकथा करता है तथा कलह-वैर-विकथा ये तीनों करता है। वह सत्य का घात करता है, शील-सदाचार का घात करता है, विनय का विघात करता है और सत्य, शील तथा विनय-इन तीनों का घात करता है / असत्यवादी लोक में द्वेष का पात्र बनता है, दोषों का घर बन जाता है और अनादर का पात्र बनता है तथा द्वेष, दोष और अनादर-इन तीनों का पात्र बनता है। क्रोधाग्नि से प्रज्वलितहृदय मनुष्य ऐसे और इसी प्रकार के अन्य सावध वचन बोलता है। अतएव क्रोध का सेवन नहीं करना चाहिए। इस प्रकार क्षमा से भावित अन्तरात्मा–अन्तःकरण वाला हाथों, पैरों, नेत्रों और मुख के संयम से युक्त, शूर साधु सत्य और आर्जव से सम्पन्न होता है / तीसरी भावना-निर्लोभता १२४–तइयं-लोभो ण सेवियन्वो, 1 लुद्धो लोलो भणेज्ज अलियं खेत्तस्स व वत्थुस्स व कएण, 2 लुद्धो लोलो भणेज्ज अलियं, कित्तीए लोभस्स व कएण, 3 लुद्धो लोलो भणेज्ज अलियं, इड्ढीए व सोक्खस्स व कएण, 4 लुद्धो लोलो भणेज्ज अलियं, भत्तस्स व पाणस्स व कएण, 5 लुद्धो लोलो भणज्ज अलियं, पीढस्स व फलगस्स व कएण, 6 लुद्धो लोलो भणेज्ज अलियं, सेज्जाए व संथारगस्स वकएण, 7 लद्धो लोलो भणेज्ज अलियं, वत्थस्स व पत्तस्स व काएण, 8 लुद्धो लोलो भणेज्ज अलियं, कंबलस्स व पायपुंछणस्स व कएण, 9 लुद्धो लोलो भणेज्ज अलियं, सीसस्स व सिस्सिणीए व कएण, लुद्धो लोलो भणेज्ज अलियं, अण्णेसु य एवमाइसु बहुसु कारणसएसु लुद्धो लोलो भणेज्ज अलीयं, तम्हा Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.003478
Book TitleAgam 10 Ang 10 Prashna Vyakaran Sutra Stahanakvasi
Original Sutra AuthorN/A
AuthorMadhukarmuni, Shobhachad Bharilla
PublisherAgam Prakashan Samiti
Publication Year1989
Total Pages359
LanguagePrakrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size8 MB
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