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________________ के अनुसार अर्थ करके विकृत मार्ग का अनुसरण करते हैं। प्रचीन महर्षियों की कथन-पद्धति का वास्तविक तथ्य एवं प्रक्रिया का पारम्परिक बोध न होने से मनमाना अर्थ लगाकर समाज में दूषण फैलाने वाले अथवा आक्षेपसिद्धि के लिये दुर्वृत्ति के लोग ऐसा करते हैं। 'जैन-साहित्य में प्रयुक्त मांस-मत्स्यादि शब्दों के वास्तविक अर्थ' आधनिक व्यवहार में प्रचलित अर्थ कथमपि नहीं है, यह निश्चित है। इस तथ्य को 'मानव-भोज्य-मीमांसा' ग्रन्थ के द्वितीय प्रकरण में अत्यन्त विस्तार से पंन्यास श्री कल्याणविजयजी गणी ने स्पष्ट किया है। प्रसिद्धार्थ और अप्रसिद्धार्थ का विवेक नहीं रखने से ही अल्पज्ञ वर्ग ऐसी दुर्भावनाएँ फैलाते हैं । सूर्य-प्रज्ञप्ति में 'नक्षत्र-भोजन' की बात नक्षत्रों के दोष से मुक्त होने के लिये उनकी तुष्टि करने वाले पदार्थों के भोजन से संबद्ध है। ज्योतिषशास्त्र में वारदोष, तिथिदोष, ग्रहदोष, शकुनदोष, दुर्योग आदि की निवृत्ति के लिये ऐसे उपाय बहुधा दिखाये गये हैं, उन्हीं को यहां भी उदारहण के रूप में प्रसङ्गपूर्वक संक्षेप में दिया होगा। यह धारण अवश्य ही स्वीकरणीय है। 'मुहूर्त-चिन्तामणि' में भी ऐसे नक्षत्रों के दोष से छुटकारा पाने के लिये खाद्य-वस्तुओं का कथन हुआ है। उनमें भी 'मांस' शब्द प्रयुक्त है। किन्तु उसके प्रसिद्ध टीकाकार गोविन्द ज्योतिर्वित् ने अपनी 'पीयुषधारा' टीका में स्पष्ट लिखा है कि – 'नक्षत्रदोहदं कुल्माषनित्यादिकमिदं भक्ष्याभक्ष्यं वर्णभेदेन देशभेदेन वा भक्ष्यमेतदभक्ष्यमिति विचार्य भक्ष्यसम्भवे भक्षयते अभक्ष्यसम्मवे आलेकयेत् पश्येत् स्पृशेद् वेत्यपि ध्येयम्।' (पृ. ३९०, निर्णयसागर बम्बई प्रकाशन)। इसका सारांश यह है कि - 'नक्षत्रदोहद के पालन में वर्णभेद और देशभेद के आधार पर भक्ष्याभक्ष्य का विचार करके जैसा उचित हो वह करे। यदि भक्ष्य न हो तो उसको देखे अथवा स्पर्श करे' - वहीं नारद के किसी ग्रन्थ का तथा वसिष्ठ, कश्यप, श्रीपति और भट्ट उत्पल द्वारा भी नक्षत्र-दोहद कथन का संकेत दिया है। अपने कथन के प्रमाण में टीकाकार ने 'गुरु' के वचनों को उद्धृत करते हुये बतलाया है कि – 'अत्र यदभक्ष्यं दुष्प्रापं वा तत् समत्वा दृष्ट्वा दत्त्वा गन्तव्यमित्याह गुरुः।' इससे स्पष्ट है कि ये दोहद-भक्ष्य जनसाधारण को लक्ष्य में रखकर सूचित किये थे और उनमें विवेक को प्रधानता दी थी। __ आचार्य श्रीमलयगिरि ने इस प्रसंग की व्याख्या में सामान्य अर्थ के रूप में 'कृत्तिका में प्रारब्ध कार्य निर्विघ्न सिद्ध हो, तदर्थ दधिमिश्रित ओदन का भोजन किया जाता है' इतना कहकर 'शेष सूत्रों में देखें' कह दिया है। आचार्य श्री घासीलालजी महाराज ने अपनी व्याख्या प्रमेह-बोधिनी में (दशम प्राभूत के सत्रहवें प्राभृत-प्राभृत में) 'नामैकदेशग्रहणेन नामग्रहणं भवतीति नियमात्' कहकर 'वृषभमांस से धतुरे का सार अवथा चूर्ण ग्राह्य है ' ऐसा बतलाया है तथा मृगमांस का अर्थ इन्द्रावरुणी वनस्पति, दीपकमांस-अजवाइन का चूर्ण, मण्डूकमांस-मण्डूकपर्णी का चूर्ण, नखीमांस-वाघनखी का चूर्ण, वराहमांस-वाराहीकन्द का चूर्ण, जलचरमांस-जलचर कुम्भिका का चूर्ण, तिन्तिणीकमांस-इमली का चूर्ण - ऐसे अर्थ स्पष्ट किये हैं। आचार्य श्री अमोलकऋषिजी ने भी अपनी व्याख्या में ऐसे ही अर्थों को व्यक्त किया है, जिसकी तालिका इस प्रकार है - द्रष्टव्य, टीका ग्रन्थ, पृ. १०४८ से १०५२ तक। श्री सूर्यप्रज्ञप्तिसूत्रम् (प्रथम भाग), अ. भा. श्वे. स्था. जैन शास्त्रोद्धार समिति, अहमदाबाद से प्रकाशित। [ ३९ ]
SR No.003459
Book TitleSuryaprajnapti Chandraprajnapti
Original Sutra AuthorN/A
AuthorMadhukarmuni, Kanhaiyalal Maharaj, Shobhachad Bharilla
PublisherAgam Prakashan Samiti
Publication Year1989
Total Pages302
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Agam, Canon, Geography, agam_suryapragnapti, & agam_chandrapragnapti
File Size4 MB
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